198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘ब्राह्मण! जब उसने भोजन में निग्रह को संयत कर लिया हो तब तथागत उसे
अगला पाठ इस प्रकार देते हैं, ‘आओ भिक्षुओ! जागरूकता (सति) का अभ्यास
करो। दिन के समय, जब चल रहे हो या बैठे हो, अपने चित्त को उन चित्त मलों
से दूर कर परिशुद्ध करते रहो जो तुम्हें विघ्न पहुँचा सकते हैं। रात के समय पहले
पहर में चलते-फिरते या बैठकर व्यतीत करो और इसी समान रात के समय दूसरे
पहर में दाहिनी करवट सिंह-आसन में लेट जाओ, और एक पैर दूसरे पैर पर
रखते हुए, जागरूकता और सम्यम, अपने विचारों में एकाग्रता की भावना केन्द्रित
करो। तब रात के तीसरे पहर में उठ जाओ और चिलते-फिरते या बैठकर, अपने
चित्त को चित्त-मलों से परिशुद्ध करो जो तुम्हें विघ्न पहुँचा सकते हैं।’’ 25. ‘‘ब्राह्मण! जब भिक्षु जागरूकता के प्रति समर्पित और हो जाता है, तथागत उसे
अगला पाठ इस प्रकार देते हैं, ‘‘आओ भिक्षुओ! जागरूकता और स्मृति सम्यक
ज्ञान से युक्त हो आत्म-नियन्त्रण से सम्पन्न होओ। आगे चलते हुए या पीछे
हटते हुए, स्वयं को नियंत्रण में रखो। आगे देखते हुए या पीछे देखते हुए झुकते
हुए या विश्राम करते हुए, चीवर धारण करते हुए या चीवर और पात्र ले जाते
हुए, खाते हुए, चबाते हुए, चखते हुए शौच जाते हुए, चलते हुए, खड़े हुए,
बैठे हुए, लेटे हुए, सोते हुए या जागते हुए, बोलते हुए या मौन रहते हुए स्वयं
को नियन्त्रण में रखें।’’
- ‘‘ब्राह्मण, जब वह आत्म-नियन्त्रण से सम्पन्न होता है, तथागत उसे अगला पाठ
इस प्रकार देते हैं, आओ भिक्षुओ! एक एकान्त आवास खोजो, चाहे वन हो या
एक पेड़ की जड़, चाहे पहाड़ हो या एक गुफा या एक पहाड़ी कंदरा, चाहे
एक श्मशान-भूमि हो या खुला एक वन आश्रम, खुला आकाश, एक पुआल
या ढेर।’ और वह वैसा ही करता है। और जब उसने अपना भोजन ग्रहण कर
लिया हो, वह पालथी मार कर बैठता है और अपने शरीर को सीधा रखते हुए,
वह चारों ध्यानों के अभ्यास की ओर बढ़ता है।’’
- ‘‘ब्राह्मण! उन सभी भिक्षुओ के लिये जिन्होंने अभी तक चित्त पर अधिपत्य
नहीं प्राप्त किया है, जो प्रयत्नशील होने के लिये प्रतिबद्ध हैं, उनके लिये मेरा
ऐसा प्रशिक्षण है।’’
- ‘‘किन्तु उन भिक्षुओं के लिये जो अर्हत हैं, जिन्होंने अपने आस्रवों को नष्ट कर
लिया है, जिन्होंने अपना जीवन जी लिया है, अपने कार्यों को निपटा लिया है,
जो कृत्कृत्य है, जो अपने सिर के बोझ को उतार चुके है, स्वयं अपनी मुक्ति
प्राप्त करा चुके हैं, जिन्होंने भव-बन्धनों को पूर्णतया नष्ट कर लिया है और
प्रज्ञा द्वारा विमुक्त हैं, ऐसों के लिये उपरोक्त श्रेष्ठ जीवन में सुख में सहायक
हैं और साथ ही आत्म-नियन्त्रण के प्रति सतर्क रहने के लिये हैं।’’