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- इसमें एक मनुष्य सम्यक् दृष्टि रखता है, वह निश्चित रूप से समझता है कि
दान देने में, त्याग करने में और बलिदान देने में पुण्य है, शुभ और अशुभ कर्मों
का फल और परिणाम होता है_ यह लोक है, परलोक है, माता है, पिता है
और स्वोत्पन्न प्राणी है_ संसार में ऐसे श्रमण और ब्राह्मण हैं जिन्होंने परलोक
का साक्षात्कार कर लिया है और वे उसकी घोषणा कर सकते हैं। भिक्षुओ! यह
‘दृष्टि-लाभ’ कहलाता है।
- इन्हीं तीन लाभों के कारण प्राणी, मरणोपरान्त शरीर बिखर जाने पर सुगति में,
स्वर्गलोक में पुर्नजन्म लेते हैं। भिक्षुओ! इस प्रकार के ये तीन लाभ हैं।
2. जीवन में पूर्णता प्राप्त करना धम्म है
ये तीन पूर्णतायें होती हैं।
शरीर की पूर्णता, वारणी की पूर्णता और चित्त की पूर्णता।
और चित्त की पूर्णता क्या है?
आस्रवों अथवा चित्त मलों के क्षय द्वारा, स्वयं ही इसी जीवन में चित्त-विमुक्ति
की प्राप्ति का अनुभव करते हुए चित्त-विमुक्ति होती है, अन्तदृषि्र्ट पैदा होती
है, जो आस्रवों से मुक्त होती है, उसे प्राप्त कर, उसी में विहार करता है। यह
‘‘चित्त की पूर्णता’’ कहलाती है। ये तीन पूर्णताएं है।
- यहाँ दूसरी पूर्णतायें (पारमितायें) भी हैं। बुद्ध ने उन्हें सुभूति को समझाया
था।
सुभूति ने पूछा ‘‘बोधिसत्व की दान-पारमिता क्या है?’’
तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘यहाँ एक बोधिसत्व, सभी प्रकार के ज्ञान से संलग्न
अपने विचारों के साथ, दान देता है, अर्थात् भीतरी या बाहरी वस्तुओं का, और
उन्हें सभी प्राणियों के लिये सार्वजनिक बना कर, वह उन्हें सर्वोच्च ‘बोधि’ को
समर्पित कर देता है, वह दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा देता है। किन्तु
किसी भी वस्तु के प्रति उसकी आसक्ति नहीं है।’’
सुभूति ने पूछा, ‘‘एक बोधिसत्व की शील-पारमिता क्या है?’’
तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘वह स्वयं दस कुशल-पथों के वचनानुसार जीवन व्यतीत
करता है, और साथ ही दूसरों को भी वह ऐसा करने की प्रेरणा देता है।’’
- सुभूति ने पूछा, ‘‘एक बोधिसत्व की क्षान्ति-पारमिता क्या है?’’