210 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘वह स्वयं क्षमा-शीलता को प्राप्त कर लेता है, और
दूसरों को भी वह क्षमा-शीलता के लिये प्रेरित करता है।’’
- सुभूति ने पूछा, ‘‘एक बोधसत्व की वीर्य-पारमिता क्या है?’’
- तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘वह सतत पाँचों पारमिताओं की पूर्ति में संलग्न रहता
है, और दूसरों को भी वह ऐसा करने के लिये प्रेरित करता है।’’ 14. सुभूति ने पूछा, ‘‘बोधिसत्व की समाधि-पारमिता क्या है?’’ 15. तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘वह स्वयं उपाय की निपुणता द्वारा ध्यानों का लाभ
करता है समाधियों में प्रवेश करता है, फिर भी वह तत्संबंधी रूप-लोकों में
पुनर्जन्म नहीं लेता, जैसा कि वह कर सकता है और दूसरों को भी वह ऐसा
करने के लिये प्रेरित करता है।’’
- सुभूति ने पूछा, ‘‘एक बोधिसत्व की प्रज्ञा-पारमिता क्या है?’’
- तथागत उत्तर दिया, ‘‘वह किसी भी भौतिक या अभौतिक वस्तु के गुण-धर्म
में नहीं फँसता है, वह सभी गुण-धर्मों की मूलभूत वास्तविक प्रकृति पर विचार
करता है_ और दूसरों को भी वह सभी गुण धर्मोर्ं पर विचार करने के लिए
प्रेरित करता है।’’
- इन परमिताओं का पोषण करना धम्म है।
3. निर्वाण प्राप्त करना धम्म है
- भगवान बुद्ध ने ऐसा कहा है, ‘‘निर्वाण से बढ़कर सुखद कुछ नहीं है।’’
- भगवान बुद्ध द्वारा उपदिष्ट सभी सिद्धांतों में निर्वाण का सिद्धांत सबसे प्रमुख
है।
- निर्वाण क्या है? भगवान बुद्ध द्वारा उपदिष्ट निर्वाण का अर्थ और सार पूर्णतया
भिन्न हैं, जो उनके पूर्वजों ने इसको किया था।
- उनके पूर्वजों की दृष्टि में निर्वाण से उसका तात्पर्य आत्मा की मुक्ति था।
- अतः चार प्रकार के रूप थे, जिनसे निर्वाण पर विचार किया जाता थाः
(1) लौकिक (भौतिक, खाओ, पिओ और मौज मनाओ), (2) यौगिक,
(3) ब्राह्मणवादी और (4) उपनिषदिक।
- ब्राह्मणवादी और उपनिषदिक अवधारणाओं में निर्वाण का एक समान लक्षण था।
वे आत्मा की एक स्वतन्त्र सत्ता के रूप में मान्यता की अपेक्षा करते थे-यही