3. निर्वाण प्राप्त करना धम्म है - Page 240

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एक सिद्धान्त है, जिसको बुद्ध ने अस्वीकार किया था। इसलिये भगवान बुद्ध

को निर्वाण के ब्राह्मणवादी और उपनिषदिक सिद्धान्त को अस्वीकार करने में

कोई कठिनाई नहीं थी।

  1. निर्वाण की लौकिक अवधारणा इतनी भौतिक थी कि वह कभी भी भगवान

बुद्ध को आकर्षित नहीं कर सकती थी। इसका अभिप्राय कुछ नहीं, बल्कि

मनुष्य की पशु-प्रवृत्ति को सन्तुष्ट करना है। इसमें कुछ भी आध्यात्मिक तत्त्व

नहीं था।

  1. भगवान बुद्ध को प्रतीत होता था कि निर्वाण की ऐसी अवधारणा को स्वीकार

करना, जिससे किसी मनुष्य की बड़ी से बड़ी हानि हो सकती थी।

  1. इन्द्रिय-प्रवृत्तियों की सन्तुष्टि का परिणाम केवल उस भूख को बढ़ाने का ही

कारण बनती थी, जीवन की ऐसी पद्धति कोई सुख नहीं ला सकती। इसके

विपरीत, इस प्रकार का सुख अवश्य ही और अधिक दुख लाने वाला था।

  1. निर्वाण की यौगिक अवधारणा एक सर्वथा अस्थायी अवस्था थी। इसका सुख

नकारात्मक था। इसके माध्यम से संसार से अलगाव सम्भव था। यह दुख से

बचना था, किन्तु कोई सुख सम्भव नहीं था। इससे जो कुछ भी सुख प्राप्त करने

की आशा की जा सकती थी, वह तभी तक टिकता जब तक योग टिकता है।

यह स्थायी नहीं बल्कि अस्थायी था।

  1. भगवान बुद्ध के निर्वाण की अवधारणा अपने पूर्वजों की अवधारणा से सर्वथा

भिन्न है।

  1. भगवान बुद्ध के तीन मत हैं, जो उनके निर्वाण की अवधारणा के आधार हैं।

  2. इनमें से एक है सचेतन प्राणी का सुख, जो आत्मा की मुक्ति से सर्वथा भिन्न है।

  3. दूसरा मत संसार में जीते जी सचेतन प्राणी का सुख है, किन्तु आत्मा की मुक्ति

और मरणोपरान्त की मुक्ति का विचार भगवान बुद्ध की निर्वाण की अवधारण्

ा के लिये पूर्णतया अनुपयुक्त है।

  1. तीसरा मत जो भगवान बुद्ध के निर्वाण की अवधारणा का मूलाधार है, वह

सदैव प्रज्ज्वलित रहने वाली राग-द्वेषाग्नि को नियन्त्रण में लाकर शांत करना।

  1. राग-द्वेष प्रज्ज्वलित अग्नि के समान हैं यह बात भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को

अपने प्रवचन में बोधा-गया में कही थी, गया में ठहरे हुए दिया था। उन्होंने

क्या कहा था-

  1. ‘‘हे भिक्खुओ! सभी कुछ जल रहा है। भिक्खुओ, सभी कुछ क्या जल रहा है?’’