3. निर्वाण प्राप्त करना धम्म है - Page 241

212 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. ‘‘हे भिक्खुओ! चक्षु-इन्द्रिय जल रही हैं, रूप जल रहा है, चक्षु-विज्ञान जल

रहा है, चक्षु-संस्कार जल रहा है, और उस संस्कार से जो कुछ भी सुख-दुख

या असुख-अदुख वेदना उत्पन्न होती है, वह भी जल रही है।’’ 19. ‘‘और ये किससे जल रहे हैं?’’

  1. ‘‘मैं कहता हूँ, ये रागाग्नि से जल रहे है, द्वेषाग्नि से जल रहे हैं, मोहाग्नि से

जल रहे हैं_ वे जाति, जरा, मरण, दुख, दौर्मनस्य, दुर्गति, शोक और निराशा से

जल रहे हैं।’’

  1. ‘‘भिक्षुओं! श्रोत-इन्द्रिय जल रही हैं, शब्द जल रहा है, घ्राण-इन्द्रिय जल रही है,

गन्ध जल रहा है, जिह्वा-इन्द्रिय जल रही है, रस जल रहा है, शरीर जल रहा

है, विचार जल रहे हैं और चित्त द्वारा प्राप्त संस्कार से जो कुछ भी सुख-दुख

या असुख-अदुख वेदना उत्पन्न होती है, वह वेदना भी जल रही है।’’ 22. ‘‘और ये किससे जल रहे हैं?’’

  1. ‘‘मैं कहता हूँ, ये रागाग्नि से जल रहे हैं, द्वेषाग्नि से जल रहे हैं, मोह-अग्नि

से जल रहे हैं, वे जाति, जरा, मरण, दुख_ दौर्मनस्य, दुर्गति, शोक और निराशा

से जल रहे हैं।’’

  1. ‘‘हे भिक्खुओ! यह अनुभव करके, विज्ञ और श्रेष्ठ अपने मन में उपेक्षा उत्पन्न

करते हैं। और इस उपेक्षा को उत्पन्न करने से रागाग्नि आदि की शान्ति होती

है, और रागाग्नि आदि के शान्त होने से वह मुक्त हो जाता है, और जब वह

मुक्त हो जाता है तो वह अवगत हो जाता है कि वह मुक्त है।’’ 25. निर्वाण कैसे सुखद हो सकता है? यह अगला प्रश्न है, जो व्यवस्था की अपेक्षा

करता है।

  1. सामान्य तौर पर यह कहा- समझा जाता है कि अभाव मनुष्य को दुखी बनाता

है, किन्तु यह सदैव सत्य नहीं है। मनुष्य बाहुल्य के मध्य भी दुखी रहता है। 27. दुख लोभ का परिणाम है, लोभ उन लोगों को भी है, जिनके पास है, साथ ही

साथ उन लोगों को भी है, जिनके पास नहीं है।

  1. यह बात भगवान बुद्ध के द्वारा भिक्खुओं को दिये एक उपदेश में स्पष्ट कर

दी है, जिसमें उन्होंने कहा था-

  1. ‘‘भिक्षुओ! लोभ से लुब्ध, द्वेष से दुष्ट, मोह से मूढ़, अभिभूत चित्त और वशीभूत

चित्त सहित मनुष्य स्वयं अपने-अपने अशुभ कार्यों से दुखी रहते हैं, मनुष्य

दूसरों की दुर्भावनाओं से दुखी रहते हैं, मनुष्य मानसिक वेदना और पीड़ा का

अनुभव करते हैं।’’