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- ‘‘ किन्तु यदि, किसी भी तरह, लोभ और मोह का विनाश हो जाये, तो मनुष्य
न तो स्वयं अपने दुःखों से दुःखी होगा और न ही मानसिक वेदना और पीड़ा
से ही।’’
- ‘‘अतः भिक्षुओ! निर्वाण इसी जीवन में प्राप्य है और केवल भविष्य में ही नहीं,
यह आकर्षक, मनोहर तथा बुद्धिमान श्रावक की पहुंच के भीतर है।
- इसमें यह बात स्पष्ट हो जाती है कि मनुष्य को क्या जला डालती है और उसे
दुखी बना देती है। प्रज्ज्वलित अग्नि के समान मनुष्य के राग-द्वेष की अग्नि
जलती के समान कहकर भगवान बुद्ध ने मनुष्य के दुख की सबसे सशक्त
व्याख्या दी है।
- राग-द्वेषों की अधीनता ही मनुष्य को दुखी बनाती है। ये राग-द्वेष संयोजन
(बंधन) कहे जाते हैं, जो मनुष्य को निर्वाण की अवस्था तक पहुँचने से रोकते
हैं। जिस क्षण वह अपने राग-द्वेषों के प्रभाव से मुक्त हो जाता है, वह निर्वाण
प्राप्त करना सीख लेता है, मनुष्य के सुख का मार्ग उसके लिये खुल जाता है
और वह दुःख का अंत कर सकता है।
भगवान बुद्ध ने अपने विश्लेषण में इन संयोजनों को तीन वर्गों में विभक्त किया है।
पहलाः वह जो सभी श्रेणियों की तृष्णा या मोह से है, जैसे कि कामुकता या
आसक्ति और लोभ का उल्लेख करता है।
- दूसराः वह जो सभी श्रेणियों के विद्वेष से है, जैसे घृणा, क्रोध, चिढ़ या द्वेष
का उल्लेख करता है।
- तीसराः वह जो सभी श्रेणियों की अविद्या है, जैसे भ्रान्ति, जड़ता और मूर्खता
(मोह या अविद्या) का उल्लेख करता है।
- पहला (राग) अग्नि और दूसरी (द्वेष) अग्नि का सम्बन्ध मनोभावों तथा दूसरे
प्राणियों के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण और भावनाओं के पूरे मापदण्ड से है,
जबकि तीसरी (मोह) अग्नि का सम्बन्ध उन सभी विचारों से है जो किसी भी
प्रकार से सत्य से भिन्न हैं।
भगवान बुद्ध के निर्वाण के सिद्धान्त के विषय में कुछ भ्रान्तियाँ हैं।
शब्द की व्युत्पत्ति को दृष्टि से निर्वाण का अर्थ है बुझ जाना।
शब्द की इस व्युत्पत्ति को लेकर आलोचकों ने निर्वाण के सिद्धान्त को दो कौड़ी
का नहीं रहने दिया एवं अर्थ का अनर्थ करके सर्वथा बेहूदा सी चीज बना देने
की चेष्टा की है।