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- निर्वाण का अर्थ सभी प्रवृत्तियों का बुझ जाना नहीं है। यह सारिपुत्त द्वारा
निम्नलिखित उपदेश में भी स्पष्ट किया गया हैः
- ‘‘एक बार भगवान बुद्ध श्रीवास्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में विहार
करते थे, जहाँ सारिपुत्त भी ठहरे हुए थे।’’
- तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए कहा, ‘‘भिक्षुओ! आप लोग
भौतिक-वस्तुओं के नहीं, बल्कि मेरे धम्म के दायाद बनो, तुम सभी के प्रति
मेरी अनुकम्पा है। मैं इसको सुनिश्चित करने का उत्सुक हूँ।’’ 58. तब इस प्रकार कहकर तथागत उठे और अपनी गन्ध-कुटी में चले गये। 59. सारिपुत्त पीछे रह गये और भिक्षुओं ने उनसे स्पष्ट करने को कहा कि निर्वाण
क्या है?
- तब सारिपुत्त ने भिक्षुओं के उत्तर में कहा, ‘‘भिक्षुओ! आप जानते हैं कि लोभ
घृणित है, तथा घृणित है विद्वेष।’’
- ‘‘इस लोभ और इस विद्वेष से छुटकारा पाने के लिये, मध्यम-मार्ग है, जो हमें
देखने के लिये आँखें देता है और हमें ज्ञात करवाता है, हमें शान्ति, अभिज्ञा,
बोधि तथा निर्वाण की ओर ले जाता है।’’
- ‘‘यह मध्यम-मार्ग क्या है? यह और कुछ नहीं, बल्कि सम्यक् दृष्टि, सम्यक्
संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यर्क कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम,
सम्यक स्मृति तथा सम्यक् समाधि ही आर्य आष्ट्रांगिक मार्ग ही है। यही, भिक्षुओ!
मध्यम-मार्ग है।’’
- ‘‘हाँ, भिक्षुओ! क्रोध घृणित है, द्वेष घृणित है, ईर्ष्या और जलन घृणित हैं,
कंजूसी और कृपणता घृणित है, लालच घृणित है, पाखण्ड, छल-कपट, और
घमण्ड घृणित है, गर्व घृणित है, तथा प्रमाद घृणि है।’’
- ‘‘मोह और प्रमाद को छोड़ देने के लिये मध्यम-मार्ग है, जो हमें देखने के लिये
आँखें देता है, हमें ज्ञान करवाता हैं और शान्ति, अभिज्ञा, बोधि तथा निर्वाण की
ओर ले जाता है।’’
‘‘निर्वाण कुछ नहीं, बल्कि वही आर्य आष्ट्रांगिक मार्ग है।’’
इस प्रकार भदन्त सारिपुत्त ने उपदेश दिया, जो कुछ उन्होंने कहा उस पर
प्रसन्नचित हो भिक्षु प्रमुदित हुए।
- अतः निर्वाण के मूल में जो विचार है वह यही है कि यह सदाचार का मार्ग
है। किसी को निर्वाण से कुछ और समझने की गलती नहीं करनी चाहिये।