216 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- सम्पूर्ण उच्छेदवाद एक अन्त है और ‘परिनिर्वाण’ दूसरा अन्त है। ‘निर्वाण’
मध्यम-मार्ग है।
- इस प्रकार समझ लिये जाने पर निर्वाण के विषय में सभी भ्रान्तियाँ दूर हो
जायेंगी।
4. तृष्णा का त्याग करना धम्म है
- धम्मपद में भगवान बुद्ध ने कहा है, ‘‘स्वास्थ्य से बढ़ कर कोई लाभ नहीं है
और सन्तोष से बढ़ कर कोई मूल्यवान धन नहीं है।’’
- सन्तोष की भावना का अर्थ बेचारगी, दब्बूपन या परिस्थितियों के सामने झुक
जाना नहीं समझना चाहिये।
- क्योंकि ऐसा समझ लेना भगवान बुद्ध की अन्य शिक्षाओं के सर्वथा प्रतिकूल
होगा।
भगवान बुद्ध ने ऐसा कभी नहीं कहा कि ‘‘वे भाग्यवान हैं जो दरिद्र हैं।’’
भगवान बुद्ध ने कभी नहीं कहा कि पीडि़तों को अपनी अवस्था एवं परिस्थितियों
को बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिये।
- दूसरी ओर उन्होंने ‘ऐश्वर्य’ का स्वागत किया है। अपनी परिस्थिति की ओर से
उपेक्षावान् होकर पड़े-पड़े कष्ट सहते रहने के उपदेश के स्थान उन्होंने वीर्य,
एवं उत्साहपूर्वक परिस्थिति को बदलने के प्रयास का उपदेश दिया।
- भगवान बुद्ध का क्या अभिप्राय है जब उन्होंने कहा कि सन्तोष सबसे बड़ा धन
है कि मनुष्य को स्वयं लोभ के वशीभूत नहीं होने देना चाहिये जिसकी कोई
सीमा नहीं है।
- जैसा कि भिक्षु रट्ठपाल ने कहा, ‘‘मैं धनी मनुष्यों को देखता हूँ, जो मूर्खतावश,
कभी किसी को कुछ नहीं देते हैं। अधिकतर संचय करते हैं, नये सुखों के लिये
प्यासे रहते हें। राजा जिनके राज्य समुद्र तक विस्तृत है, समुद्रपार के साम्राज्यों
तक शासन करने के लिये लालायित होते हैं। अभी भी लालसा है, राजा और
प्रजा सभी संसार से गुजर जाते हैं। अभाव है, अभी भी अभाव है, वे अपने शरीर
त्याग देते हैं, किन्तु कभी इस पृथ्वी पर उनकी इच्छा की तृप्ति नहीं होती।
- महा-निदान-सुत्त में भगवान बुद्ध ने आनन्द को लोभ को वश में रखने की
आवश्यकता को स्पष्ट किया है। यह है तथागत ने जो कहा है।
- ‘‘यह इस प्रकार है आनन्द! कि तृष्णा लाभ की इच्छा के कारण अस्तित्व में