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आती हैं, जब लाभ की इच्छा स्वामित्व का अनुराग बन जाती है, जब स्वामित्व
की भावना, स्वामित्व के दुराग्रह, को जन्म देती है। यह कृपणता बन जाती
है।’’
- अनियंत्रित लोभी मूल प्रवृत्ति द्वारा उत्पन्न कृपणता या स्वामित्व पर निगाह रखने
की आवश्यकता है।
- ‘‘इस तृष्णा या लोभ को क्यों वश में किया जाये? क्योंकि इसी के कारण,’’
बुद्ध ने आनन्द से कहा, ‘‘बहुत सी बुरी और दुष्ट वस्तुओं की अवस्थायें उत्पन्न
होती हैं, प्रहार और आघात, संघर्ष, विवाद, और प्रयुत्तर, झगड़े, झूठी निंदा और
झूठ बोले जाते हैं।’’
- ‘‘कि यही वर्ग-संघर्ष का समुचित विश्लेषण है, इसमें कोई सन्देह नहीं हो
सकता है।’’
- इसीलिये ही भगवान बुद्ध ने लोभ और तृष्णा को वश में रखने का उपदेश दिया था।
5. सभी संस्कार अनित्य हैं-यह मानना धम्म है
अनित्यता के सिद्धान्त के तीन पहलू हैं।
संयुक्त वस्तुएं अनित्य हैं।
व्यक्तिगत रूप से प्राणी अनित्य है।
प्रतीत्य-समुत्पन्न वस्तुएं स्व-तत्त्व अनित्य हैं।
महान बौद्ध दार्शनिक असंग द्वारा सभी वस्तुओं की अनित्यता भली-भांति स्पष्ट
की गयी है।
- उसंग कहते हैं, ‘‘सभी वस्तुएं हेतुओं और प्रत्ययों के संयोग से उत्पन्न हुई हैं
तथा उनका अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। जब संयोग विघटित हो जाता
है तो उनका विनाश सुनिश्चित है।
- ‘‘एक प्राणी का शरीर चार महाभूतों अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु के
संयोग से बना है, और जब चारों महाभूतों का यह संयोग विघटित हो जाता है,
तो उसके परिणामस्वरूप भरण होता है।’’
- अनेक तत्त्वों के मेल से बनी हुई चीजें अनित्य हैं, कहने का यही अभिप्राय
है।
- सजीव प्राणी की अनित्यता को सबसे अच्छी व्याख्या यही है कि वह है नहीं,
वह हो रहा है इस सूत्र द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।