218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- इस अर्थ में भूतकाल का प्राणी जीवन व्यतीत कर चुका है, किन्तु वर्तमान में
जी नहीं रहा है और न ही भविष्य में जीवित रहेगा। एक भविष्यकाल का प्राणी
भविष्य में जीवित रहेगा, किन्तु न भूतकाल में जीवित रहा है और न ही वर्तमान
में जी रहा है। वर्तमान काल का प्राणी जी रहा है, किन्तु भूतकाल में जीवित
नहीं रहा और न ही भविष्य में जीवित रहेगा।
- संक्षेप में एक मनुष्य सदैव परिवर्तनशील है, सदैव संवर्धनशील है। वह अपने
जीवन के दो भिन्न क्षणों में समान नहीं है।
- अनित्यता के सिद्धांत का तीसरा पहलू एक सामान्य मनुष्य के लिए समझना
कुछ कठिन है।
- यह समझना है कि प्रत्येक सजीव प्राणी कभी न कभी मृत्यु को प्राप्त होगा,
समझने के लिए एक अत्यन्त सरल विषय है।
- किन्तु यह समझना उतना आसान नहीं है कि कैसे एक प्राणी परिवर्तित होता
रहता है, जबकि वह जीवित होता है।
- ‘‘यह कैसे संभव है?’’ भगवान बुद्ध का उत्तर था, ‘‘यह संभव है, क्योंकि
सब कुछ अनित्य है।’’
आगे चल कर इसी ‘अनित्यता’ के सिद्धान्त ने शून्यवाद को जन्म दिया।
बौद्ध धर्म की शून्यता का तात्पर्य पूर्णतया निषेध नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना
ही है कि संसार में, जो प्रति क्षण घटित होने वाला है, वह सतत् परिवर्तनशील
है।
- बहुत कम लोग समझते हैं कि ‘शून्यता’ के कारण ही सब कुछ सम्भव हो
पाता है, इसके बिना संसार में कुछ भी सम्भव नहीं हो सकता। सभी वस्तुएँ
अनित्यता के स्वभाव की सम्भावना पर निर्भर हैं।
- यदि वस्तुएँ परिवर्तनशील न हों, बल्कि स्थायी और अपरिवर्तनशील हों, तो एक
रूप से किसी दूसरे रूप में जीवन का सम्पूर्ण विकास और सजीव वस्तुओं की
प्रगति रुक जायेगी।
- यदि मनुष्य मर जाते या परिवर्तित हो जाते हैं और वे समान अवस्था में ही सदैव
बने रहें तो क्या परिणाम होगा? मानव-जाति की प्रगति सर्वथा रुक जायेगी।
- ‘यदि शून्य’ का अर्थ अभाव या रिक्त माना जाता है, तो असीम कठिनाइयाँ
उत्पन्न हो जायेंगी।