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- किन्तु यह ऐसा नहीं है। ‘शून्य’ उस बिन्दु के समान है, जिसमें तत्त्व या पदार्थ
तो है, किन्तु जिसकी कोई लम्बाई-चौड़ाई नहीं है।
- सभी वस्तुएँ अनित्य हैं, यह सिद्धान्त भगवान बुद्ध द्वारा उपदेशित किया गया
था।
- बुद्ध के इस सिद्धांत की क्या शिक्षा है? यह एक अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।
- अनित्यता के इस सिद्धान्त की शिक्षा सरल है। किसी भी वस्तु के प्रति आसक्त
न होओ।
- यह अनासक्ति, सम्पत्ति के प्रति अनासक्ति, मित्रों, इत्यादि के प्रति अनासक्ति
का अभ्यास करने के लिए उन्होंने कहा है कि सभी चीजें अनित्य हैं।
6. ‘कर्म’ को नैतिक-व्यवस्था का साधन मानना, धम्म है
- भौतिक जगत में एक व्यवस्था दिखाई देती है। यह निम्नलिखित तथ्यों से सिद्ध
होता है-
- आकाश के नक्षत्रों की गतिविधियों और कार्यों में एक निश्चित व्यवस्था है।
- उस निश्चित व्यवस्था के नियमानुसार ऋतुएँ नियमित क्रम से आती और जाती
हैं।
- उस निश्चित व्यवस्था के अनुसार बीज वृक्षों के रूप में विकसित होते हैं और
वृक्ष फल उत्पन्न करते हैं तथा फल बीज देते हैं।
- बौद्ध परिभाषिक शब्दावली में से नियम कहलाते हैं। ऐसे नियम जो एक विधिवत्
क्रम उत्पन्न करते हैं, जैसे ‘ऋतु-नियम’, ‘बीज-नियम।’
- इसी प्रकार क्या मानव समाज में भी एक नैतिक व्यवस्था है? यह कैसे उत्पन्न
हुई हैं? यह कैसे सम्पोषित की जाती है?
- जो ‘ईश्वर’ के अस्तित्व में विश्वास करते हैं, उन्हें इस प्रश्न का उत्तर देने में
कोई कठिनाई नहीं होती है और उनका उत्तर सरल है।
- वे कहते हैं, नैतिक व्यवस्था दिव्य-विधान द्वारा सम्पोषित है, ईश्वर ने संसार
की रचना की है और ईश्वर ही संसार का सर्वोच्च शासक है व कर्त्ता-धर्ता
साथ ही वह नैतिक नियमों के साथ-साथ भौतिक नियमों का रचयिता भी है। 9. उनके अनुसार, नैतिक नियम मनुष्य के हित के लिये है, क्योंकि ये दिव्य इच्छा
के परिणामस्वरूप निर्मित हैं। मनुष्य ईश्वर की आज्ञा मानने को बाध्य है, जो