220 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
उसका रचयिता है और यह ईश्वर का आज्ञापालक है, जो नैतिक व्यवस्था को
सम्पोषित करता है।
- यही तर्क इस मत के समर्थन में दिया जाता है कि नैतिक व्यवस्था ईश्वर की
इच्छा पर निर्भर करती है।
- किन्तु यह व्याख्या किसी भी तरह संतोषजनक नहीं है। क्योंकि, यदि नैतिक
नियम ‘ईश्वर’ से उत्पन्न हुए हैं और यदि ईश्वर नैतिक व्यवस्था का आदि
और अन्त है और मनुष्य ईश्वर के आज्ञा-पालन से बच नहीं सकता तो संसार
में इतनी अधिक नैतिक अव्यवस्था क्यों है?
- इस ईश्वरीय नियम के पास कौनसी शक्ति है? इस ईश्वरीय नियम का मनुष्य
पर क्या नियन्त्रण है? यह प्रासंगिक प्रश्न हैं। किन्तु जो लोग यह मानते हैं कि
संसार या नैतिक-संस्थान ईश्वर की इच्छा का परिणाम है, उनके पास इन प्रश्नों
का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं है।
- इन कठिनाइयों पर विजय पाने के लिये इस बात में थोड़ा परिवर्तन किया गया
है।
- अब ऐसा कहा जाता हैः निस्सन्देह ईश्वर की इच्छा से ही सृष्टि अस्तित्व में
आयी। यह भी सत्य है कि ब्रह्माण्ड ने उसकी इच्छा और उनके निर्देशों द्वारा
काम करना प्रारम्भ कर दिया। यह भी सत्य है कि उसने ब्राह्माण्ड को एक ही
बार में सम्पूर्ण ऊर्जा प्रदान कर दी थी, जिसने एक अति विशाल प्रक्रिया के
प्रेरक बल के रूप में कार्य किया।
- किन्तु बाद में ईश्वर ने प्रकृति के ऊपर ही छोड़ दिया कि वह स्वयं मूलतः
उनके ही द्वारा बनाये गये नियमों का अनुसरण करते हुए कार्य करती रहे।
- इसलिये यदि नैतिक व्यवस्था ईश्वर की इच्छा या आज्ञा के अनुसार कार्य करने
में असफल रहती है तो दोष प्रकृति का है न कि ईश्वर का।
- इस सिद्धान्त में थोड़ा परिवर्तन कर देने से भी कठिनाई को नहीं सुलझाया जा
सकता। यह केवल ईश्वर को अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त करने में सहायता
करता है। फिर भी यह प्रश्न बचा रहता है कि ईश्वर ने अपने नियमों के लागू
करने की जिम्मेदारी प्रकृति के ऊपर क्यों छोड़ दी? इस प्रकार की अनुपस्थित
या गैर-जिम्मेदार ईश्वर की क्या आवश्यकता है?
- इस प्रश्न का कि-‘‘नैतिक व्यवस्था कैसे संरक्षित है?’’ जो उत्तर भगवान बुद्ध
ने दिया है, वह पूर्णतया भिन्न है।