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- तथागत का उत्तर सरल था, ‘‘विश्व में नैतिक-व्यवस्था को बनाए रखने वाला
ईश्वर नहीं है, बल्कि धर्म-नियम ही है। यह उपरोक्त प्रश्न का बुद्ध का उत्तर
था।
- विश्व में नैतिक व्यवस्था चाहे अच्छी या चाहे बुरी हो, किन्तु भगवान बुद्ध के
अनुसार नैतिक व्यवस्था मनुष्य पर निर्भर करती है और किसी अन्य पर नहीं।
- ‘कर्म’ का तात्पर्य है, मनुष्य द्वारा किया जाने वाला कर्म और विपाक का मतलब
ह,ै उसका परिणाम है। यदि नैतिक व्यवस्था बुरी है, तो वह इसलिये क्योंकि
मनुष्य अकुशल कर्म करता है। यदि नैतिक व्यवस्था अच्छी है, तो वह इसलिये
क्योंकि मनुष्य कुशल (अच्छा) कर्म करता है।
- भगवान बुद्ध केवल कर्म के विषय में कहने से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने कर्म-नियम
के विषय में भी कहा, जो कर्म-नियम का एक अन्य नाम है।
- कर्म-नियम के विषय में कहते हुए भगवान बुद्ध यह व्यक्त करना चाहते हैं कि
कर्म का परिणाम उतनी निश्चितता से कर्म का अनुसरण करने को बाध्य है, जैसे
रात्रि, दिन का अनुसरण करती है। यह एक नियम या कानून के समान है।
- कोई भी कुशल कर्म के अच्छे परिणाम से लाभ उठाने से असफल नहीं हो
सकता है और कोई भी अकुशल कर्म के बुरे प्रभावों से नहीं बच सकता है।
- इसलिये भगवान बुद्ध की देशना थीः कुशल कर्म करो, जिससे कि एक अच्छी
नैतिक व्यवस्था को सहायता मिले-जिसे बनाए रखने से मानवता लाभान्वित हो।
अकुशल कर्म मत करो, क्योंकि बुरी नैतिक-व्यवस्था से अकुशल कर्म उत्पन्न
होंगे, जिससे मानवता कष्ट झेलेगी।
- यह हो सकता है कि जिस समय कर्म किया गया हो और परिणाम प्राप्ति के
मध्य समय का थोड़ा-बहुत अन्तराल हो। प्रायः ऐसा होता ही है।
- इस दृष्टिकोण से, कर्म के कई प्रकार होते है, (1) दिट्ठधम्म वेदनीय वेदनिय
कम्म (तत्काल परिणामी कर्म), (2) उपपज्जवेदनीय कम्म (सुदूर परिणामी
कर्म) और (3) अपरापरिवेदनीय वेदनिय कम्म (अनिश्चित काल में परिणामी
कर्म)।
- कभी-कभी कम्म अहोसि कम्म की श्रेणी में भी आ सकता है, अर्थात् ऐसा
कर्म जो अप्रभावी है। इस अहोसि में ऐसे सभी कम्म समाहित हैं, जो परिचालित
होने के लिये अत्यन्त दुर्बल हैं, या जो एक अधिक सबल कम्म द्वारा बाधित
हैं, उस समय जब उन्हें प्रभावित होना चाहिये।