222 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- किन्तु इन सभी बातों के लिये गुंजाइश बनाने के बाद यह किसी भी अर्थ में
भगवान बुद्ध द्वारा किये गये दावे से कि कम्म का नियम अटल है कर्म का
नियम लागू होकर ही रहता है।
- कर्म के सिद्धान्त का आवश्यक तौर पर यह तात्पर्य नहीं कि करने वाले को
कर्म का फल भुगतना पड़ता है और इससे अधिक कुछ नहीं, ऐसा समझना
एक गलती है। कभी-कभी किसी कर्म के कर्त्ता को प्रभावित करने के स्थान
पर किसी दूसरे को प्रभावित करते हैं। तथापि यह कर्म-नियम की प्रक्रिया ही
है, क्योंकि यह या तो नैतिक व्यवस्था को संभालती है या अस्त-व्यस्त करती
है।
- मनुष्य आते रहते हैं और मनुष्य जाते रहते हैं। किन्तु विश्व में नैतिक-व्यवस्था
बनी रहती है और साथ ही वह कर्म का नियम भी, जो इसे बनाये रखता है।
- इसी कारण भगवान बुद्ध में नैतिकता को वह स्थान दिया है, जो अन्य धर्मों में
ईश्वर को स्थान दिया गया है।
- अतः इस प्रश्न का कि-‘‘विश्व में नैतिक-व्यवस्था किस प्रकार बनी रहती
है?’’ बुद्ध ने जो उत्तर दिया है, वह इतना सरल और इतना अकाट्य है।
- और फिर भी इसका वास्तविक अर्थ शायद ही पूर्णरूपेण समझा गया है। प्रायः
लगभग सदैव, यह तो गलत समझा गया है या अयथार्थ विवरण दिया गया है
या गलत व्याख्या की गयी है। बहुत कम लोग समझते प्रतीत होते हैं कि कर्म
नियम का सिद्धांत बुद्ध द्वारा यह प्रश्न कि-‘‘नैतिक व्यवस्था कैसे सम्पोषित
है?’’ के उत्तर में प्रस्तुत किया गया था।
तथापि, बुद्ध के कर्म-नियम के सिद्धांत का यही उद्देश्य है।
कर्म-नियम का सम्बन्ध केवल सामान्य नैतिक व्यवस्था के प्रश्न से है। इसका
किसी मनुष्य के सौभाग्य या दुर्भाग्य से कुछ भी लेना-देना नहीं है।
इसका सम्बन्ध विश्व में नैतिक-व्यवस्था के सम्पोषण से ही है।
यह इसी कारण से कर्म का नियम, धम्म का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।