226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- जो लोग ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं उसकी व्याख्या किसी ऐसे
प्राणी के रूप में करते हैं, जो सर्व-शक्तिमान, सर्व-व्यापक और सर्वअन्तर्था भी
(सर्वज्ञ) है।
- ईश्वर में कुछ ऐसे विशेष नैतिक गुण भी हैं, जो ईश्वर पर आरोपित किये गये
हैं, ईश्वर को शिव (भला) कहा जाता है, ईश्वर को न्यायी कहा जाता है और
ईश्वर को दयालु कहा जाता है।
- प्रश्न यह है कि क्या तथागत ने ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में स्वीकार किया
है?
उत्तर है, ‘नहीं’। उन्होंने स्वीकार नहीं किया।
ऐसे अनेक कारण हैं, जिनकी वजह से तथागत ने ईश्वर के अस्तित्व के सिद्धान्त
को अस्वीकार किया है।
किसी ने भी ‘ईश्वर’ को नहीं देखा है। लोग केवल ईश्वर की चर्चा करते हैं।
ईश्वर ‘अज्ञात’ और ‘अदृश्य’ है।
कोई भी यह सिद्ध नहीं कर सकता कि ईश्वर ने संसार की रचना की है। संसार
का विकास हुआ है, निर्माण नहीं हुआ।
- ‘ईश्वर’ में विश्वास करने से क्या लाभ हो सकता है? यह अलाभपद्र है।
- भगवान बुद्ध ने कहा कि जो धर्म ईश्वर पर आश्रित है, वह निराधार व कल्पना
पर आश्रित है।
इसलिये ईश्वर पर आश्रित कोई धर्म, रखने के योग्य नहीं है।
इससे केवल अन्धविश्वास उत्पन्न होता है।
भगवान बुद्ध ने इस प्रश्न को यहीं और यूँ ही छोड़ दिया है। उन्होंने इस प्रश्न
के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की है।
- जिन आधारों पर भगवान बुद्ध ने सिद्धान्त को अस्वीकार किया है उसके अनेक
कारण थे।
- उन्होंने तर्क प्रस्तुत किया कि ईश्वर के अस्तित्व का सिद्धान्त सत्य पर आधारित
नहीं है।
- यह भगवान बुद्ध वसेट्ठ और भारद्वाज नामक दो ब्राह्मणों के साथ अपने संवाद
में स्पष्ट कर दिया है।