228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘वासेट्ठ! जिस प्रकार, अंधे लोगों की कतार हो, न आगे चलने वाला अंधा
देख सकता हो, न बीच में चलने वाला देख सकता और न पीछे चलने वाला
अंधा देख सकता हो, ठीक उसी प्रकार, मैं सोचता हूँ, वासेट्ठ! क्या ब्राह्मणों
का कथन और कुछ नहीं, बल्कि अंधा कथन है? पहला नहीं देख सकता, मध्य
वाला नहीं देख सकता और न ही आखिर वाला देख सकता है। इन ब्राह्मणों का
कथन हास्यास्पद, शब्द मात्र, एक हास्यास्पद, व्यर्थ और निस्सार है।’’
- ‘‘वासेट्ठ! क्या वह वैसा ही मामला नहीं है, कि किसी मनुष्य का किसी ऐसी
औरत से प्रेम हो गया है, जिसे उसने देखा ही नहीं है?’’ ‘‘हाँ, यह तो ऐसा
ही है’’, वासेट्ठ ने उत्तर दिया।
- ‘‘वासेट्ठ! अब तुम क्या सोचते हो? यदि लोग उस आदमी से पूछेंगे कि मित्र?
अच्छा मित्र! जिस प्रदेश की यह सबसे सुन्दर स्त्री है, जिससे तुम इस प्रकार
प्रेम करते हो और जिसके लिये लालायित रहे हो, वह कौन है? क्या वह एक
कुलीन स्त्री है, या एक ब्राह्मण स्त्री है, या वैश्य जाति की है या शूद्र है?’’
- ‘‘वासेट्ठा! महाब्रह्मा, तथाकथित सृष्टिकर्ता की उत्पत्ति के विषय में’’ चर्चा करते
हुए, तथागत ने भारद्वाज और वासेट्ठ को सम्बोधित करते हुए कहा, ‘‘मित्रों!
वह प्राणी जो सबसे पहले पैदा हुआ, वह इस प्रकार सोचने लगाः मैं महाब्रह्म
हूँ, विजेता हूँ, अविजित हूँ सर्वदृष्टा हूं, सर्वाधिकारी हूं, मासिक हूं, निर्माता हूं,
रचयिता हूं, मुख्य हूं, व्यवस्थापल हूं, महाब्रह्म अधिन्यसक हूँ, आप ही अपना
स्वामी हूँ, वे सब जो भविष्य में पैदा होने वाले हैं, सबका पिता हूँ, मुझ में ही
से ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं।’’
- ‘‘इसका यह तात्पर्य हुआ कि ब्रह्मा उन सब का पिता है जो हैं और भविष्य
में होने वाले हैं।’’
- ‘‘तुम कहते हो कि यह जो पूज्य ब्रह्मा, विजेता, अविजित, जो उन सब का
पिता है जो हैं और भविष्य में होने वाले हैं, जिसके द्वारा हम सब की उत्पत्ति
हुई है, वह स्थायी, सतत, नित्य, अपरिवर्तनीय है, और अनन्त काल तक ऐसा
ही रहेगा। तब हम जो उस ब्रह्म द्वारा उत्पन्न किये गये हैं, इधर से आये हैं,
सभी अस्थायी, अनित्य अस्थिर, अल्प-जीवी, मरणधर्मी क्यों हैं?’’
इसका वासेट्ठ के पास कोई उत्तर नहीं था।
उनके तीसरे तर्क में ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का उल्लेख था। ‘‘यदि ईश्वर
सर्वशक्तिमान है और साथ ही सृष्टि का कर्त्ता है, तो इस कारण से मनुष्य में
कुछ भी करने की कोई इच्छा नहीं हो सकती, और न उसे कुछ भी करने की