2. ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास अ-ध्म्म है। - Page 258

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कोई आवश्यकता है, और न ही उसमें कुछ भी करने या कोई प्रयास करने का

संकल्प पैदा हो सकता है। मनुष्य अवश्य ही एक निष्क्रिय प्राणी बना रहेगा,

जिसको संसार के कार्यकलापों में कोई भाग नहीं निभाना होगा। यदि यह ऐसा

ही है, तो ब्रह्म ने मनुष्य की उत्पत्ति ही क्यों की?’’

  1. इसका भी वासेट्ठ के पास कोई उत्तर नहीं था।

  2. उनका चौथा तर्क था कि यदि ईश्वर अच्छा (शिव) है, तो क्यों मनुष्य हत्यारे,

चोर, व्यभिचारी, झूठे, चुगलखोर, बकवादी, लोभी, विद्वेषी और कुमार्गी बन

जाते हैं? इसका कारण अवश्य ही ईश्वर होगा। किसी अच्छे भले ईश्वर के

रहते क्या यह सम्भव है?

  1. उनका पाँचवाँ तर्क ईश्वर के सर्वज्ञ, न्यायी और दयालु होने से सम्बन्धित था।

  2. ‘‘यदि कोई ऐसा सर्वोच्च सृष्टिकर्ता है, जो न्यायी और दयालु है, तो संसार में

इतना अधिक अन्याय क्यों हो रहा है?’’ तथागत ने पूछा-‘‘वह जिसके पास

आंखें भी हैं, जो दर्दनाक हालात को देख सकता है, क्यों नहीं वह अपनी

रचनाओं को ठीक करता है? यदि उसकी शक्ति असीम है कि कोई उसे नियंत्रित

करने वाला नहीं, तो क्यों उसके हाथ कल्याण करने के लिय इतने रुकते हैं

और उसकी सारी रचनायें दुख क्यों झेल रही हैं? वे सभी को सुख क्यों नहीं

देती? छल-कपट झूठ और अज्ञान क्यों प्रचलित है? झूठ सत्य पर विजय प्राप्त

क्यों करता है? क्यों सत्य और न्याय असफल हो जाते हैं? मैं तुम्हारे ब्रह्म को

अन्यायी मानता हूँ जिसने केवल अन्याय को आश्रय देने के लिये एक संसार

का निर्माण किया है।’’

  1. ‘‘यदि कोई ऐसा ईश्वर सर्वशक्तिमान है, जो प्राणियों को सुखी या दुखी बनाता है

और कार्यों में उनसे पाप-पुण्य कराता है, तो ऐसा ईश्वर भी पाप से अभिरंजित

है। या तो मनुष्य ईश्वर की इच्छानुसार कार्य नहीं करता या ईश्वर न्यायी और

कल्याणकारक नहीं है या ईश्वर अंधा है।’’

  1. ईश्वर के सिद्धांत के विरुद्ध उनका अगला तर्क यह था कि ईश्वर के अस्तित्व

के विषय में इस प्रश्न की चर्चा से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

  1. भगवान बुद्ध के अनुसार धर्म का केन्द्र मनुष्य के ईश्वर से सम्बन्ध पर स्थित

नहीं है। यह मनुष्य के मनुष्य से संबंध पर स्थित है। मनुष्य को शिक्षित करना

धर्म का उद्देश्य है कि वह अन्य लोगों के साथ कैसा व्यवहार करें, जिससे कि

सभी सुखी रह सकें।