230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- एक और भी कारण था, जिसकी वजह से तथागत ईश्वर के अस्तित्व पर
विश्वास के विरुद्ध थे।
- भगवान बुद्ध धार्मिक अनुष्ठानों, समारोहों और व्यर्थ के धार्मिक क्रिया-कलापों
के विरुद्ध थे। वे उनके विरुद्ध इसलिए थे, क्योंकि अन्धविश्वास के घर होते
हैं तथा अन्धविश्वास सम्यक्-दृष्टि का शत्रु होता है जो कि उनके आर्य
आष्ट्रांगिक-मार्ग का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है।
- भगवान बुद्ध की दृष्टि में ईश्वर में विश्वास सबसे खतरनाक बात थी, क्योंकि
ईश्वर के विश्वास ने पूजा और प्रार्थना के पाखण्डी कार्य में विश्वास को
बढ़ावा दिया तथा पूजा और प्रार्थना की क्षमता ने पुरोहित के पद को बढ़ावा
दिया और पुरोहित ही वह दुष्ट एवं शरारती दिमाग वाला व्यक्ति था, जिसने
सभी अन्धविश्वासों को जन्म दिया और उसी ने सम्यक्-दृष्टि के विकास को
अवरुद्ध कर दिया।
- ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास के विरुद्ध इन तर्कों में कुछ व्यावहारिक थे
किन्तु उनमें से अधिकतर दार्शनिक थे। लेकिन तथागत जानते थे कि वे ईश्वर
के अस्तित्व में विश्वास के लिये मारक-तर्क नहीं हैं।
- तथापि, यह नहीं सोचना चाहिये कि तथागत के पास ऐसे कोई तर्क नहीं थे।
एक तर्क, जिसे उन्होंने प्रस्तुत किया, जो निस्सन्देह ईश्वर में विश्वास के लिये
प्राणघातक है। यह उनके प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धान्त में समाहित है।
- इस सिद्धान्त के अनुसार यह मुख्य प्रश्न नहीं हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है या
नहीं है, और न तो यह वास्तविक प्रश्न है कि क्या ईश्वर ने सृष्टि कैसे की?
यदि इस प्रश्न का ठीक-ठीक उत्तर दिया जा सके कैसे संसार की रचना हुई,
तो उसमें से जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास के लिये कुछ औचित्य का
निष्कर्ष मिल सकता है।
- ‘‘अब महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या ईश्वर ने अभाव (शून्य) में से कुछ
उत्पन्न किया या उसने भाव (कुछ) में से कुछ उत्पन्न किया?’’
- यह विश्वास करना असम्भव है कि ‘कुछ नहीं’ (शून्य) में से कुछ की रचना
की जा सकती है।
- यदि तथाकथित ईश्वर ने ‘कुछ’ में से सृष्टि की रचना की है, तो वह कुछ
जिसमें से नया कुछ उत्पन्न किया है, उसके द्वारा कोई वस्तु उत्पन्न किये जाने
से पहले से ही अस्तित्व में था। अतः ईश्वर उस ‘कुछ वस्तु’ का सृष्टिकर्त्ता