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नहीं कहा जा सकता है, जो पहले से ही अस्तित्व में है। यदि ईश्वर द्वारा किसी
वस्तु की रचना पहले से ही मौजूद ‘कुछ वस्तु’ में से उत्पन्न की गयी है तो,
ईश्वर की सृष्टिकर्ता या आदि कारण नहीं कहा जा सकता है। 57. भगवान बुद्ध का ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास के विरुद्ध ऐसा उनका अन्तिम
किन्तु अकाट्य तर्क था, जिसका कोई जवाब नहीं था।
- मूल-स्थापना ही मिथ्या होने के कारण, ईश्वर को सृष्टि के सृष्टिकर्ता पर
विश्वास अधम्म है। यह केवल ‘झूठ’ में विश्वास करना है।
3. ब्रह्म से संयोजन पर आधारित धम्म मिथ्या धम्म है
- जब भगवान बुद्ध अपने धम्म का प्रचार कर रहे थे, उस समय ‘वेदान्त’ नामक
एक सिद्धान्त प्रचलित था।
उस सिद्धान्त के मत थोड़े और सरल हैं।
सृष्टि के पीछे जीवन का एक मूलतत्त्व सर्वव्यापी है, जिसे ‘ब्रह्म’ या ‘ब्रह्मन्’
कहा जाता है।
यह ‘ब्रह्म’ एक वास्तविकता है।
‘आत्मन्’ या व्यक्तिगत आत्मा ‘ब्रह्म’ के समान ही है।
जीवात्मा और ‘ब्रह्मात्मा’ को जो वास्तव में एक हैं, एक मान लेने से ही मनुष्य
की ‘मोक्ष’ लाभ हो सकता है। यह दूसरा सिद्धान्त है।
- ‘जीवात्मा’ और ‘ब्रह्मात्मा’ को, जो वास्तव में एक ही हैं, एक मान लेने से,
जब इसका ज्ञान हो जाता है।
- ‘जीवात्मा’ और ‘ब्रह्मात्मा’ की एकता का बोध प्राप्त करने के लिए संसार का
त्याग आवश्यक है।
यही सिद्धान्त वेदान्त कहलाता है।
इस सिद्धान्त के लिये बुद्ध के मन में कोई आदर नहीं था। उनको लगता था
कि इसका आधार ही मिथ्या है, इसकी जीवन में कुछ उपयोगिता नहीं है और
इसीलिए यह अपनाने योग्य नहीं है।
- यह उन्होंने भारद्वाज और वासेट्ठ, दो ब्राह्मणों के साथ हुई अपनी चर्चा में स्पष्ट
कर दिया था।