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उत्तर नकारात्मक है।
एक दूसरा उदाहरण दिया जा सकता है। कानून में भी यह सामान्य बात है कि
प्रस्ताव को एक मूल अवधारणा के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, जिसका
अस्तित्व सिद्ध नहीं है परन्तु जिसे सत्य स्वीकार कर लिया जाता है। 30. और हम सभी ऐसी एक ‘कानूनी कल्पना’ को स्वीकार करते हैं। 31. किन्तु ऐसी ‘कानूनी कल्पना’ को क्यों स्वीकार किया जाता है? 32. इसका कारण यह है कि एक ‘कानूनी कल्पना’ इसलिये स्वीकार की जाती है,
क्योंकि उससे लाभप्रद और न्याय-संगत परिणाम निकलता है। 33. ‘‘ब्रह्म भी एक कल्पना है। इससे कौन सा लाभप्रद परिणाम निकलता है?’’ 34. वासेट्ठ और भारद्वाज मौन थे।
- तर्क को भली-भांति समझने के लिये वे वासेट्ठ की ओर मुड़े और पूछा, ‘‘क्या
तुमने ब्रह्म को देखा है?’’
- ‘‘क्या तीन वेदों के जानकार इन ब्राह्मणों में से कोई भी एक ऐसा है, जिसने
कभी आमने-सामने ब्रह्म के दर्शन किये हैं?’’
‘‘नहीं, निस्सन्देह, गौतम।’’
‘‘क्या तीन वेदों के जानकार इन ब्राह्मणों के गुरुओं में से कोई भी एक ऐसा
है, जिसने आमने-सामने ब्रह्म के दर्शन किये हों?’’
‘‘नहीं, निस्सन्देह, गौतम।’’
‘‘क्या वासेट्ठ, इन ब्राह्मणों की सात पीढि़यों में से कोई भी एक ऐसा है जिसने
आमने-सामने ब्रह्म के दर्शन किये हों?’’
‘‘नहीं, निस्सन्देह, गौतम।’’
‘‘अच्छा तो, वासेट्ठ-क्या ब्राह्मणों के प्राचीन ऋषियों ने कभी इस प्रकार कहा
हैः ‘‘हम इसे जानते हैं, हमने इसके दर्शन किये हैं, हम जानते हैं। ब्रह्म कहाँ
है, ब्रह्म किधर है?’’
‘‘ऐसा नहीं है, गौतम।’’
भगवान बुद्ध ने दोनों ब्राह्मण बालकों से अपने प्रश्न पूछना जारी रखा, और कहाः
‘‘तो वासेट्ठ! अब तुम क्या सोचते हो? यदि यह ऐसा ही है, तो क्या इसका
परिणाम यह नहीं होगा, कि ब्रह्म के साथ संयोजन के विषय में ब्राह्मणों की
सारी चर्चा मूर्खतापूर्ण चर्चा मात्र ही है?