234 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘वासेट्ठ! जिस प्रकार अंधे लोगों की एक कतार हो। न तो सबसे आगे चलने
वाला देख सकता है और न बीच वाला देख सकता है और न ही पिछला देख
सकता है-ठीक उसी प्रकार से, मैं सोचता हूँ, वासेट्ठ, क्या ब्राह्मणों का कथन
और कुछ नहीं, बल्कि अंधा कथन है? पहला नहीं देखता है, मध्य वाला नहीं
देखता है, और न ही आखिर वाला देख सकता है। इन ब्राह्मणों का कथन
हास्यास्पद, शब्द मात्र, व्यर्थ और निस्सार वस्तु मात्र है।’’
- ‘‘वासेट्ठ! जिस प्रकार एक मनुष्य यह कहे, ‘मैं एक स्त्रि से प्रेम करता हूं,
जिसे उसने कभी नहीं देखा है। वह अत्यन्त सुन्दर है।’’
- वासेट्ठा! जब कैसा होगा कि लोग उस मनुष्य से पूछें, ‘क्यों मित्र? प्रदेश की
वह सबसे सुन्दर स्त्री, जिससे तुम इस प्रकार प्रेम करते हो और जिसके लिये
लालायित हो, क्या तुम उसका नाम जानते हो? वह सुन्दर स्त्री कुलीन स्त्री है
या ब्राह्मण स्त्री है, या वैश्य जाति की है, या शूद्र हैं?’’
‘‘किन्तु जब ऐसा पूछा जाये तो वह उत्तर देगा ‘नहीं’।’’
‘‘और जब लोग उससे यह पूछें, ‘क्यों भले मित्र! सभी प्रदेशों में यह सबसे
सुन्दर स्त्री, जिससे तुम प्रेम करते हो और जिसके लिये लालायित रहते हो,
क्या तुम जानते हो उस सबसे सुन्दर स्त्री का क्या नाम है, या उसका कुल
नाम क्या है, कि वह लम्बी है या छोटी है या मध्यम ऊँचाई की है, काले,
भूरे या सुनहरे रंग की है, या किस गांव, कस्बे या नगर में रहती है?’ किन्तु
जब ऐसा पूछा जाये तो वह उत्तर देगा ‘नहीं’।’’
- ‘‘वासेट्ठ! अब तुम क्या सोचते हो, क्या यह इस प्रकार नहीं लगता कि उस
मनुष्य का कथन मूर्खतापूर्ण कथन है?’’
दोनों ब्राह्मणों ने कहा, ‘‘वास्तव में, गौतम! यह ऐसा ही है।’’
अतः ब्रह्म, यथार्थ नहीं है और उस पर आधारित कोई भी धर्म व्यर्थ है।
4. आत्मा में विश्वास अधम्म है
- भगवान बुद्ध ने कहा कि आत्मा पर आधारित धर्म निराधार एवं कल्पनों पर
आश्रित है।
किसी ने भी न तो आत्मा को देखा है और न उससे बातचीत की है।
आत्मा अज्ञात और अदृश्य है।