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- वह वस्तु जो विद्यमान है वह आत्मा नहीं, बल्कि मन या चित्त है। चित्त आत्मा
से भिन्न होता है।
उन्होंने कहा आत्मा में विश्वास करना अलाभप्रद है।
अतः आत्मा पर आधारित धर्म अपनाने योग्य नहीं है।
यह केवल अन्धविश्वास उत्पन्न करने वाला है।
बुद्ध ने इस प्रश्न को यहाँ यहीं नहीं छोड़ दिया। उन्होंने इसके सभी पहलुओं
पर चर्चा की है।
- आत्मा के अस्तित्व में विश्वास उतना ही सामान्य है, जितना कि ईश्वर के
अस्तित्व में विश्वास।
आत्मा के अस्तित्व में विश्वास भी ब्राह्मणवादी धर्म का एक भाग था।
ब्राह्मणवादी धर्म में आत्मा को आत्म या आत्मन् कहते हैं।
ब्राह्मणवादी धर्म में, आत्मन् वह नाम है जो एक तत्त्व को दिया गया है, जो
शरीर से पृथक लगातार शरीर के भीतर रहने वाला माना गया है और जन्म के
क्षण से ही वह अस्तित्व में आता है।
- आत्मा में विश्वास अपने साथ इससे सम्बन्धित अन्य विश्वासों को भी समाहित
करता है।
- आत्मा का मरण शरीर के साथ नहीं होता है। वह अन्य शरीर में जन्म लेती
है, जब वह अस्तित्व में आता है।
- आत्मा के लिये शरीर एक बाह्य परिधान के रूप में कार्य करता है।
- क्या बुद्ध आत्मा में विश्वास करते हैं? नहीं, वे नहीं करते। आत्मा के विषय
में उनका सिद्धान्त अनात्मवाद (अन्-अत्त) कहलाता है।
- एक अशरीरी आत्मा स्वीकृत करने पर, विभिन्न प्रश्न उत्पन्न होते हैंः आत्मा
क्या है? यह कहां से आती है? शरीर के मरण पर इसका क्या होता है? यह
कहां जाती है? ‘परलोक’ में यह किस रूप में विद्यमान् रहती है? वहां यह
कब तक रहती है? इन प्रश्नों पर बुद्ध ने आत्मा के सिद्धान्त के समर्थकों से
तर्क-वितर्क करने का प्रयास किया था।
- सबसे पहले उन्होंने तर्क करने के अपने सामान्य तरीके द्वारा यह बताने का
प्रयास किया कि आत्मा के विषय में विचार कितना गोलमोल था।