236 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- जो आत्मा के अस्तित्व में विश्वास रखते थे, उनसे उन्होंने पूछा, आत्मा आकार
और स्वरूप में कैसी है?
- आनन्द को उन्होंने कहा कि आत्मा से सम्बन्धित घोषणायें प्रचुर हैं। कुछ घोषित
करते हैं ‘मेरी आत्मा का एक रूप है और वह सूक्ष्म है।’ अन्य घोषित करते हैं
कि आत्मा का रूप है और वह असीम एवं सूक्ष्म है। कुछ अन्य इसे निराकार
और अनन्त घोषित करते हैं।
‘‘आनन्द! अनेक तरीकों से आत्मा से सम्बन्धित घोषणायें की गयी हैं।’’
‘‘उन लोगों द्वारा जो आत्मा में विश्वास रखते हैं किस प्रकार आत्मा की कल्पना
की गयी है?’’ यह एक अन्य प्रश्न था, जो बुद्ध द्वारा उठाया गया था। कुछ
कहते हैं, ‘‘मेरी आत्मा (सुख-दुख), अनुभूति-जन्य है।’’ दूसरे कहते हैं, ‘‘नहीं,
मेरी आत्मा अनुभूति-जन्य नहीं है, मेरी सचेतन नहीं हैं’’ या कोई-कोई कहते
हैं, पुनः ‘‘नहीं मेरी आत्मा तो अनुभूति जन्य है, और न यह सचेतन है, मेरी
आत्मा अनुभूति जन्य है, इसमें सचेतन के गुण हैं।’’ इस तरह के पहलुओं के
अधीन आत्मा की कल्पना की गयी है।
- ‘जो आत्मा’ के अस्तित्व में विश्वास रखते थे, भगवान बुद्ध ने उन लोगों से
पूछा कि शरीर के मरणोपरान्त आत्मा की क्या स्थिति होती है?
- भगवान बुद्ध ने यह प्रश्न भी उठाया कि क्या शरीर के मरणोपरान्त आत्मा देखी
जा सकती है?
उन्हें असंख्य गोल-मटोल उत्तर प्राप्त हुए।
क्या शरीर के मरणोपरान्त ‘आत्मा’ अपने रूप (आकार-प्रकार) को बनाये रखती
है? उन्होंने देखा कि इस प्रश्न की आठ भिन्न-भिन्न परिकल्पनाएं थीं।
- क्या शरीर के साथ ‘आत्मा’ मर जाती है? इस पर भी अनगिनत परिकल्पनाएँ
थीं।
- भगवान बुद्ध ने यह भी पूछा कि शरीर के मरने के बाद आत्मा के सुख या
दुख के प्रश्न को भी उठाया। क्या शरीर के मरने के बाद आत्मा सुखी है? इस
पर भी श्रमणों और ब्राह्मणों में मतभेद था। कुछ ने कहा, यह पूर्णतया दुखी
थी। कुछ ने कहा वह सुखी थी। कुछ ने कहा, सुखी और दुखी दोनों है तथा
कुछ ने कहा यह न तो सुखी और न ही दुखी है।
- ‘आत्मा’ के अस्तित्व के विषय में इन सभी मतों का उनका उत्तर वही था, जो
उन्होंने चुन्द को दिया था।