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- भगवान बुद्ध ने चुन्द को कहा ‘‘अब, चुन्द! उन श्रमणों और ब्राह्मणों के पास
जाता हूँ, जो इन मतों में से किसी एक पर विश्वास रखते हैं और स्वीकार करते
हैं और यह कहता हूँ ‘क्या यह ऐसा है मित्रों?’ और यदि वे उत्तर देते हैं ‘हाँ।
केवल यह ही सत्य है, शेष सब मत निरर्थक हैं।’ मैं उनके दावे को स्वीकार
नहीं करता हूँ। ऐसा क्यों है? क्योंकि ऐसे प्रश्नों पर लोगों के भिन्न-भिन्न मत
हैं। और न तो मैं इस पर उस मत को अपने समान मानता हूँ, श्रेष्ठ मानने की
तो बात ही नहीं।’’
- अब अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि ‘आत्मा’ के अस्तित्व के विरुद्ध बुद्ध के
तर्क क्या थे?
- आत्मा के खण्डन के समर्थन में उन्होंने, जो सामान्य तर्क प्रस्तुत किये थे। वे वहीं
थे, जो उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व के खण्डन के समर्थन में प्रस्तुत किये थे।
- उन्होंने तर्क दिया कि ‘आत्मा’ के अस्तित्व की चर्चा उतनी ही अलाभप्रद है,
जितनी ईश्वर के अस्तित्व की चर्चा।
- उन्होंने तर्क दिया कि ‘आत्मा’ के अस्तित्व में विश्वास सम्यक दृष्टि के विकास
में उतना ही बाधक है, जितना ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास।
- उन्होंने तर्क दिया कि आत्मा के अस्तित्व में विश्वास अन्धविश्वास का उतना
ही एक स्रोत है, जितना ईश्वर में विश्वास। निस्सन्देह उनकी सम्मति में एक
आत्मा के अस्तित्व में विश्वास ईश्वर में विश्वास की अपेक्षा बहुत अधिक
खतरनाक है। क्योंकि न केवल यह एक पुरोहितवपाद को उत्पन्न करता है, न
केवल यह सभी अन्धविश्वासों का मूल है, बल्कि यह पुरोहितवाद को मनुष्य
पर जन्म से मृत्यु तक पूर्ण नियन्त्रण प्रदान करता है।
- इन सामान्य तर्कों के कारण यह कहा जाता है कि बुद्ध ने ‘आत्मा’ के अस्तित्व
पर कोई निश्चित सम्मति नहीं व्यक्त की है। कुछ दूसरे लोगों का कहना है
कि उन्होंने ‘आत्मा’ के अस्तित्व के मत को अस्वीकार नहीं किया। कुछ औरों
ने कहा है कि वे सदैव मसले से कतराकर बच जाते थे।
- ये कथन एकदम गलत हैं। क्योंकि महाली को सबसे सुनिश्चित शब्दों में भगवान
बुद्ध ने कहा था कि ‘आत्मा’ नाम की कोई ऐसी वस्तु नहीं है। इसलिये ‘आत्मा’
के बारे में उनका मत अनत्त (अनात्मवाद) कहलाता है।
- ‘आत्मा’ के अस्तित्व के विरुद्ध सामान्य तर्कों से पृथक, बुद्ध के पास एक
विशेष तर्क था, जिसे वे आत्मा के मत के प्रति एकदम मारक मानते थे।