238 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘आत्मा’ के अस्तित्व के विरुद्ध उनका मत एक पृथक तत्व के रूप में नामरूप
का सिद्धान्त कहलाता है।
- यह सिद्धान्त सचेतन प्राणी के संघटक अवयवों के प्रति ‘विभज्ज-वाद’
द्वारा परीक्षण, तीक्ष्ण एवं कड़े विश्लेषण का परिणाम है, जिन्हें अन्यथा मानव
व्यक्तित्व कहा जाता है।
नामरूप एक सचेतन प्राणी का सामूहिक नाम है।
बुद्ध के विश्लेषण के अनुसार, प्रत्येक सचेतन प्राणी भौतिक तत्वों और कुछ
मानसिक तत्वों के सम्मिश्रण का परिणाम है। वे भौतिक तथा मानसिक तत्त्व
खन्द (स्कन्ध) कहलाते हैं।
- रूप खन्द (स्कंध) में भौतिक तत्व, जैसे कि पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु
समाहित हैं। वे शरीर या रूप को संघटित करते हैं।
- रूप स्कन्ध के अतिरिक्त, (चित्त-चैतसिकों का समूह) नाम स्कन्ध जैसी भी
एक वस्तु है, जो एक सचेतन प्राणी का निर्माण करता है।
- यह नाम-स्कन्ध विज्ञान या चेतना कहलाता है। यह नाम-स्कन्ध तीन मानसिक
तत्वों को सम्मिलित करता है। वेदना छह इन्द्रियों तथा उनके संसारी विषयों के
सम्पर्क से उत्पन्न होने वाली अनुभूति स××ा (संज्ञा/बोध), संखार (संस्कार/
चित्त की अवस्थायें) होती हैं। विज्ञान भी इन तीनों के साथ मिल जाता है
अन्य मानसिक अवस्थाओं के साथ उनमें से एक के रूप में कही जाती हैं।
एक आधुनिक मनोविज्ञान कह सकता है कि चेतना वह मूल स्रोत है, जिसमें
से अन्य मनौवैज्ञानिक तथ्य उत्पन्न होते हैं। विज्ञान (चित्त) एक सचेतन प्राणी
का केन्द्र है।
- चेतना (विज्ञान) चार तत्वों-पृथ्वी, जल, तेज और वायु के सम्मिश्रण का
परिणाम है।
- भगवान बुद्ध द्वारा प्रतिपादित चेतना (विज्ञान) के इस सिद्धान्त पर एक आपत्ति
उठायी जाती है।
- वे जो इस सिद्धान्त पर आपत्ति करते हैं, पूछते हैं, ‘‘चेतना (विज्ञान) कैसे
उत्पन्न होती है?’’
- यह सत्य है कि चेतना (विज्ञान) मनुष्य के जन्म के साथ उत्पन्न होती है और
मृत्यु के साथ समाप्त हो जाती है। तथापि, क्या यह कहा जा सकता है कि
चेतना (विज्ञान) चार तत्वों के सम्मिश्रण का परिणाम है?