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- भगवान बुद्ध का उत्तर यह नहीं था कि भौतिक तत्वों के सह-अस्तित्व या
सम्मिश्रण से चेतना (विज्ञान) की उत्पत्ति होती है। कुछ ने इस रूप में कहा
था कि जहां किसी भी रूप-काय है, वहां नाम-काय भी साथ में रहता है।
- आधुनिक विज्ञान से एक उपमा ली जा सकती है, जहाँ-जहाँ भी विद्युत क्षेत्र
होता है, वहाँ-वहाँ सदैव एक चुम्बकीय क्षेत्र साथ-साथ होता है। कोई नहीं
जानता कि चुम्बकीय क्षेत्र कैसे निर्मित होता है, या कैसे उत्पन्न होता है? किन्तु
यह सदैव विद्युत क्षेत्र के साथ-साथ विद्यमान रहता है।
- शरीर और चेतना (विज्ञान) के मध्य विद्यमान हम कुछ-कुछ इसी समान सम्बन्ध
क्यों न मान लें?
- चुम्बकीय क्षेत्र विद्युत क्षेत्र के सम्बन्ध में एक प्रेरित क्षेत्र कहलाता है। तो फिर
हम चेतना (विज्ञान) भी रूप-कार्य के सम्बन्ध में एक प्रेरित क्षेत्र क्यों न
कहें?
- आत्मा के विरुद्ध भगवान बुद्ध का तर्क यहीं समाप्त नहीं होता। उन्हें अभी आगे
कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कहनी हैं।
- एक बार जब चेतना उत्पन्न हो जाती है, तो मनुष्य एक जीवित प्राणी बन जाता
है। इसलिये चेतना (विज्ञान) मनुष्य के जीवन में प्रमुख गुण है।
विज्ञान (चेतना) की प्रकृति है, ज्ञानात्मक, भावनात्मक और क्रियाशील है।
विज्ञान (चेतना) ज्ञानात्मक है, जब वह ज्ञान, सूचना प्रदान करती है, जैसे
महत्त्व समझना या आशंका करना, या यह आन्तरिक तथ्यों या बाह्य वस्तुओं
या घटनाओं के मूल्यांकन करने का हो सकता है।
- विज्ञान (चेतना) भावात्मक है, तब तक विशेष व्यक्तिपरक अवस्थाओं में विद्यमान
रहती है, जो या तो अनुकूल-अनुभूतियाँ या प्रतिकूल अनुभूतियाँ हो सकती है,
जब भावात्मक चेतना अनुभूति उत्पन्न करती है।
- विज्ञान (चेतना) अपनी क्रिया-शील अवस्था में प्राणी को उद्देश्य-विशेष की
सिद्धि के लिये स्वयं प्रयास करने को प्रोत्साहित करती है। क्रिया-शील चेतना
उसे उत्पन्न करती है, जिसे हम संकल्प या क्रियाशीलता कहते हैं।
- इस प्रकार यह स्पष्ट है कि एक सचेतन प्राणी की सभी क्रियाएं, जो चेतना के
द्वारा और चेतना के परिणामस्वरूप सचेतन प्राणी द्वारा निष्पादित होता है।
- इस विश्लेषण के उपरान्त भगवान बुद्ध ने पूछा, ‘‘ऐसी कौन-सी क्रियाएं हैं,