240 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
जो आत्मा द्वारा निष्पादित होने के लिए छूट गयी हैं? ‘आत्मा’ के लिये निर्दिष्ट
सभी क्रियाएं विज्ञान (चेतना) द्वारा निष्पादित की जाती है।
बिना किसी क्रिया के एक ‘आत्मा’ निरर्थक है।
इस प्रकार से भगवान बुद्ध ने ‘आत्मा’ के अस्तित्व को असिद्ध किया है।
इसलिये आत्मा का अस्तित्व किसी भी तरह धम्म का अंग नहीं हो सकता।
5. यज्ञ (बलि-कर्म) में विश्वास अ-धम्म है
(i)
ब्राह्मणवादी धर्म यज्ञों पर आधारित था।
कुछ यज्ञ ‘नित्य’ के रूप में वर्गीकृत थे और कुछ ‘नैमित्तिक’ रूप में वर्गीकृत
थे।
- ‘नित्य’ यज्ञ नैतिक बाध्यता थे, जो अनिवार्य रूप से निष्पादित किये जाते थे,
भले ही किसी को उनसे कोई फल प्राप्त हुआ हो या नहीं। 4. ‘नैमित्तिक’ यज्ञ जब निष्पादित किये जाते थे, तब यजमान सांसारिक लाभ के
रूप में कुछ वस्तु अर्जित करना चाहता था।
- ब्राह्मणवादी यज्ञों में सुरा-पान, पशुओं की बलि और आमोद-प्रमोद सम्मिलित
थे।
फिर भी ये यज्ञ धार्मिक-कृत्य समझे जाते थे।
भगवान बुद्ध ने इस तरह यज्ञों पर आधारित धर्म को अपनाने से इन्कार कर
दिया था।
- तथागत के साथ विवाद करने आए अनेक ब्राह्मणों को उन्होंने अपने तर्क दिये
कि यज्ञ धर्म का अंग क्यों नहीं हो सकते?
- यह विवरण मिलता है कि ऐसे तीन ब्राह्मण थे, जिन्होंने इस विषय पर उनके
साथ वाद-विवाद किया था।
उनके नाम थे, कूटदन्त, उज्जय और तीसरा था उदायी।
कूटदन्त ब्राह्मण ने तथागत से उसे यह बताने का निवेदन किया था कि वे यज्ञ
के महत्त्व के विषय में क्या सोचते हैं?