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- तब तथागत ने कहा, ‘‘अच्छा तो हे ब्राह्मण! ध्यान दो और सावधानी से सुनो
और मैं बोलूँगा।’’
- ‘‘बहुत अच्छा! ’’ कूटदन्त ने उत्तर में कहा और तथागत ने निम्नलिखित बातें
कहींः
- ‘‘हे ब्राह्मण! बहुत पहले, महाविजेता नामक एक राजा था वह बहुत, शक्तिशाली,
धनवान् और विशाल सम्पत्ति वाला था। उसके पास चांदी के भण्डार, सुख-भोग
के साधन, धन-धान वाला, धान से भरे कोठे वाला था।’’
- ‘‘जब राजा महाविजेता एक बार अकेला समाधि में बैठा था, वह इस विचार
में चिन्तित हो गयाः ‘एक मनुष्य द्वारा सुख भोगने वाली सभी वस्तुएं मेरे पास
बहुतायत में हैं। मैं विजय द्वारा पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा हूँ। यह अच्छा होगा
कि मैं एक महान् यज्ञ करूँ जो दीर्घ काल तक मेरे लिये समृद्धि और कल्याण्
ाकारी हो।’’
- ‘‘तत्पश्चात् ब्राह्मण ने जो पुरोहित था, राजा से कहाः ‘आपका राज्य, राजन्!
उत्पीडि़त और लुटा हुआ है। चारों और डाकू हैं, जो गांवों और कस्बों को लूटते
हैं और जो रास्तों को असुरक्षित करते हैं। जब तक ऐसी अवस्था है, तब तक
यदि महाराज ने एक नया कर और लगाया, तो वास्तव में महाराज गलत कार्य
करेंगे।’’
- ‘‘किन्तु हो सकता है महाराज! यह सोचेः कार्यवाही बंद कर दूंगा-उनको पकड़वा
लूंगा, उन पर जुर्माना करूंगा, उनको देश निकाल दूंगा, उनको मृत्यु-दंड दूंगा।
किन्तु उनकी उदण्डता में शीघ्र ही उन दुष्टों पर सन्तोषजनक रूप से विराम
नहीं लगाया जा सकता। लेकिन जो दण्डित बचे रहेंगे, वे राज्य को तब भी
उत्पीडि़त करते रहेंगे।’’
- ‘‘अब इस अव्यवस्था पर सम्पूर्ण विराम लगाने के लिये एक तरीका है। जो
कोई भी आपके राज्य में पशुपालन और खेती में लगा हो, उन्हें महाराज! आप
भोजन और बीज-अनाज दें। जो कोई भी आप के राज्य में व्यापार में लगा हो,
महाराज उन्हें पूँजीं दें। जो कोई भी आप के राज्य में सरकारी सेवा में लगा हो,
उन्हें महाराज! आप वेतन और भोजन दें।’’
- ‘‘तब वे प्रत्येक अपने-अपने पेशे का पालन करेंगे, तब और राज्य को उत्पीडि़त
नहीं करेंगे, राजा का राजस्व और अधिक होने लगेगा, देश शान्त और स्थिर हो
जायेगा, और जनता, एक दूसरे से सन्तुष्ट और सुखी, अपने हाथों में अपने बच्चों
को लिये नाचते हुए, बिना भय के खुले दरवाजों सहित निवास करेंगे।’’