242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- ‘‘तब हे ब्राह्मण! राजा महाविजेता ने, अपने पुरोहित के कथन को स्वीकार कर
लिया, और वैसा ही किया, जैसा उसने कहा था। और उन मनुष्यों ने अपने
पेशे का पालन करते हुए, और अधिक राज्य को उत्पीडि़त नहीं किया। राजा
का राजस्व और अधिक होने लगा। देश शान्त और स्थिर हो गया। जनता, एक
दूसरे से संतुष्ट और सुखी, अपनी गोद में अपने बच्चों को लिये नाचते हुए,
खुले दरवाजों सहित निवास करने लगी।’’
- ‘‘जब शान्ति और व्यवस्था स्थापित हो गयी थी, राजा महाविजेता ने पुनः अपने
पुरोहित को बुलवाया और कहा, ‘‘अव्यवस्था समाप्त हो गयी है। देश शान्त है।
मैं दीर्घ काल तक अपनी समृद्धि और अपने कल्याण के लिये वह महान यज्ञ
करना चाहता हूँ आदरणीय! आप मुझे निर्देश करें, कैसे करूँ?’’
- ‘‘पुरोहित ने, राजा को उत्तर देते हुए, कहा- ‘अब ऐसा ही हो। आप महाराज!
अपने राज्य में जो नगर में हैं या देश में हैं जो क्षत्रिय हैं, आपके जागीरदार हैं,
जो मंत्री हैं और जो अधिकारी हैं या जो प्रतिष्ठित ब्राह्मण हैं, या जो सम्पन्न
गृहपति हैं, उन्हें यह कहते हुए निमन्त्रण भेजें, मैं दीर्घ काल तक अपनी समृद्धि
और अपने कल्याण के लिए एक महान यज्ञ करने का विचार रखता हूँ। आदरण्
ाय, आप अपनी स्वीकृति दें।’’
- ‘‘हे ब्राह्मण टदन्त! तब राजा ने अपने पुरोहित के कथन को स्वीकार कर वैसा
ही किया, जैसा उसने कहा था। और उनमें से प्रत्येक ने-क्षत्रिय, मंत्री, ब्राह्मण
और गृहपतियों-वैसा ही उत्तर दियाः आप महाराज! यज्ञ का अनुष्ठान करें। हे
राजा! समय अनुकूल है।’’
- ‘‘राजा महाविजेता बुद्धिमान था और अनेक प्रकार से प्रतिभाशाली था। और
उसका पुरोहित भी समान रूप से बुद्धिमान और प्रतिभाशाली था।’’
- ‘‘हे ब्राह्मण! पुरोहित ने यज्ञ के प्रारम्भ होने से पहले, राजा को स्पष्ट बता दिया
कि इसमें कितना क्या सम्मिलित होगा।’’
- ‘‘कहीं ऐसा न हो महाराज! यज्ञ प्रारम्भ होने से पहले या जब वह महान यज्ञ
कर रहे हों या जब महान् यज्ञ समाप्त किया जा चुका हो, इस प्रकार कोई
पश्चाताप अनुभव करेंः ‘ओह, इसमें मेरी सम्पत्ति के विशाल अंश का प्रयोग
हो गया, महाराज! ऐसे पश्चाताप को मन में न आने दें।’’
- ‘‘हे ब्राह्मण! और आगे, पुरोहित ने, यज्ञ प्रारम्भ होने से पहले, जिस किसी ने
इसमें भाग लिया, उनके मन में किसी प्रकार का अनुताप जो सम्भवतः बाद में