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उत्पन्न हो सकता है, के सम्बन्ध में उसे रोकने के लिए कहा ‘महाराज! अब
आपके यज्ञ में ऐसे लोग आ सकते हैं, जिन्होंने सजीव प्राणियों के जीवन को
नष्ट किया हो, और ऐसे मनुष्य भी, जो इससे विरत रहे हों, ऐसे मनुष्य जिन्होंने
उधार लेकर नहीं दिया हो, और ऐसे मनुष्य भी, जो इससे विरत रहे हों_ ऐसे
मनुष्य, जो काम-भोग सम्बन्धी मिथ्याचार करते हों, और ऐसे मनुष्य भी जो
इससे विरत रहते हों, ऐसे मनुष्य जो झूठ बोलते हों और ऐसे भी जो नहीं बोलते
हों, ऐसे मनुष्य जो चुगली करते हों, और ऐसे भी जो नहीं करते हो_ ऐसे मनुष्य
जो कठोरता से बोलते हों, और ऐसे मनुष्य भी जो ऐसा न करते हों, ऐसे मनुष्य
जो व्यर्थ बकवास करते हों और ऐसे मनुष्य भी, जो इससे विरत रहते हो_ ऐसे
मनुष्य जो लोभ करते हों, और ऐसे मनुष्य भी जो लोभ न करते हों, ऐसे मनुष्य
जो मन में द्वेष रखते हों और ऐसे मनुष्य भी, जो इसे मन में न रखते हों_ ऐसे
मनुष्य जिनकी मिथ्या-दृष्टि हो, और ऐसे मनुष्य भी जिनकी सम्यक् दृष्टि हो।
इसमें से प्रत्येक को, जो बुरा करते हैं, उनकी बुराई के साथ उन्हें रहने दो।
जो भलाई करते हैं, आप महाराज! उनके लिये अनुष्ठान आयोजित करें, राजन!
उन्हें सन्तुष्ट करें, इससे आपके चित्त को आन्तरिक शान्ति प्राप्त होगी।’’
- ‘‘हे ब्राह्मण! और उस यज्ञ में न तो एक भी वृषभ का वध किया गया था, न तो
बकरियां, और न मुर्गे, न मोटे सूअर, और न किसी भी प्रकार के सजीव प्राणियों
की बलि चढ़ाई गयी थी। यूप (वध-स्तंभ) के लिये कोई वृक्ष नहीं काटा गया
था, यज्ञ-स्थल के चारों ओर बिखेरने के लिये कोई दूब घास नहीं काटी गयी थी।
और वहां कार्यरत दास, सन्देशवाहक और श्रमिक न तो दण्डित और न ही भयभीत
किए गए थे, और न ही अश्रु-मुख हो विलाप करते हुए वे काम पर लाये गये
थे। जिस किसी ने सहायता करने को चुना, उसने कार्य किया, जिस किसी ने
सहायता नहीं करने को चुना, कार्य नहीं किया। प्रत्येक ने करने को चुना, उसने
किया, जिन्होंने करने को चुना, उन्होंने बिना किये छोड़ा न था। वह यज्ञ, केवल
घी, तेल, मक्खन, दूध, शहद और शक्कर से सम्पादित किया गया था।’’
- ‘‘यदि आप कोई यज्ञ करना ही चाहते हैं, तो आप अपना यज्ञ वैसा ही होने दें,
जैसा राजा महाविजेता का था। यज्ञ अपव्यय है। पशु बलि क्रूरता है ऐसे यज्ञ
धर्म का अंग कभी नहीं हो सकते हैं। वह धर्म का एक निकृष्टतम रूप है, जो
कहता है कि पशुओं की बलि द्वारा तुम स्वर्ग जा सकते हो।’’
- कूटपन्त ने पूछा, ‘‘हे गौतम! क्या कोई ऐसा दूसरा यज्ञ है जिसमें पशुओं की
बलि देने की अपेक्षा अधिक फल मिले और अधिक कल्याण हो?’’
- ‘‘हाँ, हे ब्राह्ममण! ऐसा है।’’