244 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
‘‘हे गौतम! और वह यज्ञ कैसा होगा?’’
जब एक मनुष्य श्रद्धायुक्त हृदय से स्वयं इन शिक्षापदों के पालने का संकल्प
लेता है-जीव-हत्या से विरत रहना, चोरी से विरत रहना, काम-भोग सम्बन्धी
मिथ्याचार से विरत रहना, झूठ बोलने से विरत रहना, असावधानी के मूल
सुरा-मेरय-मद्य आदि नशीली चीजों के सेवन से विरत रहना। यह ऐसा यज्ञ है,
जो उन्मुक्त उदार दान से श्रेष्ठ है, नित्य भिक्षा दान से श्रेष्ठ है, विहार आदि
भेंट देने से श्रेष्ठ है, त्रिशरण ग्रहण करने से भी श्रेष्ठ है।’’
- और जब उन्होंने इस प्रकार कहा, तो कूटदन्त ब्राह्मण को भी कहना पड़ा ‘‘हे
गौतम! आप सर्वश्रेष्ठ हैं, आपके मुख से निकले वचन सर्वश्रेष्ठ हैं।’’
(ii)
एक समय उज्जय ब्राह्मण ने तथागत से यह पूछाः
‘‘श्रमण गौतम! क्या आप यज्ञों के प्रशंसक हैं?’’
तथागत ने उत्तर दिया, ‘‘नहीं ब्राह्मण! मैं प्रत्येक यज्ञ की प्रशंसा नहीं करता।
तथापि मैं प्रत्येक यज्ञ की प्रशंसा नहीं रोकता। हे ब्राह्मण! जिस किसी यज्ञ
में, गायों का वध किया जाता है, बकरियों और भेड़ों का वध किया जाता है,
मुर्गे-मुर्गियों और सूअरों का वध किया जाता है और नाना प्रकार के जीवित
प्राणियों का हत्या होती है-ऐसा यज्ञ, जिसमें पशु-बलि दी जाती है, हे ब्राह्मण!
मैं उसकी प्रशंसा नहीं करता। ‘‘ऐसा क्यों?’’ उज्जय ने पूछा।
- ‘‘हे ब्राह्मण! ऐसे यज्ञ में, जिसमें पशु-बलि समाहित रहता है, न तो श्रेष्ठ लोग
और न वे जो श्रेष्ठ मार्ग में प्रवेश कर चुके हैं, समीप जाते हैं।’’
- ‘‘किन्तु हे ब्राह्मण! जिस किसी यज्ञ में गायों का वध नहीं किया जाता है और
सजीव प्राणियों की बलि नहीं होते, ऐसे यज्ञ जो पशु-बलियों को समाहित नहीं
करते, मैं उनकी प्रशंसा करता हूँ।’’ जैसे कि, उदाहरण के लिये, चिर स्थापित
दान, या परिवार के कल्याण के लिये त्याग।’’
- उज्जय ने शंका की, ‘‘ऐसा क्यों?’’ तथागत ने शंका का निवारण करते हुए
कहा, ‘‘क्योंकि, ब्राह्मण! श्रेष्ठ लोग, जो श्रेष्ठ मार्ग में प्रवेश कर चुके हैं, ऐसे
यज्ञ के समीप जाते हैं जो पशु-बलियों को समाहित नहीं करते।’’
(iii)
- ब्राह्मण उदायी ने भी तथागत से वही प्रश्न पूछा, जो ब्राह्मण उज्जय द्वारा पूछा