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गया थाः
- ‘‘श्रमण गौतम! क्या आप यज्ञ की प्रशंसा करते हैं?’’ तथागत ने वही उत्तर
दिया, जो उन्होंने उज्जय को दिया था।
- उन्होंने कहा, ‘‘यथोचित समय में किया गया उपयुक्त यज्ञ और जो क्रूरता से
मुक्त है, ऐसे के समीप जाते हैं, वे जो श्रेष्ठ जीवन में भली-भाँति प्रशिक्षित
हैं, यहाँ तक कि वे भी जिन्होंने पर्दे को हटा लिया है, जबकि (अभी तक वे
पृथ्वी पर हैं), जो समय और आवागमन से परे जा चुके हैं। ऐसों की तथागत
प्रशंसा करते हैं, वे जो पुण्य में निपुण हैं। भले ही यज्ञ हो या श्रद्धायुक्त कर्म
हो, श्रद्धायुक्त हृदय से किया गया उपयुक्त त्याग हो, ऐसे पुण्य के श्रेष्ठ क्षेत्र
में जो निवास करते हैं। श्रेष्ठ जीवन इस प्रकार दिया गया उन्मुक्त, दान, इससे
देवता प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार के दान से, विज्ञ जन, विद्या का लाभ करते
हैं दुख से मुक्त हो सुखद संसार को विजित करते हैं।’’
6. कल्पनाश्रित विश्वास अ-धम्म है।
- ऐसे प्रश्नों को पूछना स्वाभाविक था जैसे कि (1) क्या मैं भूत कालों में था?
(2) क्या मैं भूत-कालों में नहीं था? (3) तब मैं क्या था? (4) मैं किसमें
से गुजर कर क्या हुआ? (5) क्या मैं भविष्य में होऊँगा? (6) क्या मैं भविष्य
में नहीं होऊँगा? (7) तब मैं क्या होऊँगा? (8) तब मैं कैसे होऊँगा? (9) मैं
किसमें से गुजर कर क्या होऊँगा? या, पुनः आज यह स्वयं हैं जिसके विषय
में वह सन्देहशील है, और स्वयं से पूछता है-(1) क्या मैं हूँ? (2) क्या मैं
नहीं हूँ? (3) मैं क्या हूँ? (4) मैं कैसे हूँ? (5) मेरा अस्तित्व कहाँ से आया?
(6) यह गुजरकर किधर जायेगा?’’
- जहाँ तब विश्व का सम्बन्ध है, विभिन्न प्रश्न उठाये गये थे। उनमें से कुछ इस
प्रकार थे-
- ‘‘किस प्रकार इस सृष्टि की रचना की गयी थी? क्या यह अनन्त है?’’
- पहले प्रश्न के उत्तर में कुछ लोग कहते थे कि प्रत्येक वस्तु ब्रह्म द्वारा रची
गयी थी-अन्य कहते थे कि यह प्रजापति द्वारा रची गयी थी। 5. दूसरे प्रश्न के उत्तर में कुछ कहते थे कि यह अनन्त है अन्य कहते थे यह
नहीं है। कुछ कहते थे यह सीमित है, अन्य कहते थे यह असीमित है। 6. बुद्ध ने इन प्रश्नों पर विचार करने से मना कर दिया था। उनका कहना था