246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
कि ऐसे प्रश्न केवल विकृत मस्तिष्क के लोगों द्वारा पूछे और विचार किये जा
सकते हैं।
- इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिये सर्वज्ञता की आवश्यकता थी, जो कोई होता
ही नहीं।
- उन्होंने कहा कि इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिये, वे ऐसे सर्वज्ञ नहीं थे। कोई
भी वह सब जानने का दावा नहीं कर सकता, जो जानना चाहते हैं वह जानना
चाहिए और न ही हम किसी समय जानना चाहते हैं उस समय ज्ञात है। सदैव
ही कुछ न कुछ ऐसा होता है, जो अज्ञात है। उनका कहना था कि वह ऐसे
सर्वज्ञ नहीं कि इस तरह के प्रश्नों का उत्तर दें। कोई यह दावा नहीं कर सकता
कि जो कुछ हम जानना चाहते हैं, वह सब कुछ जानता है और न कोई यह
दावा कर सकता है कि किसी भी समय जो कुछ हम जानना चाहते हैं वह
किसी को हर समय ज्ञात रहता है। हमेशा कुछ न कुछ अज्ञात रहता ही है।
(ii)
- जिन सिद्धान्तों को बुद्ध के समकालीन आचार्यों ने अपने-अपने धर्म का आधार
बनाया था। उनका संबंध दो बातों से था - आत्मा से और सृष्टि की उत्पत्ति से।
- उन्होंने आत्मा के विषय में कुछ विशेष प्रश्न उठाये थे। उन्होंने पूछा थाः (1) क्या
मैं भूत कालों में था? (2) क्या मैं भूत कालों में नहीं था? (3) उस समय मैं क्या
था? (4) मैं किस में से गुजर कर क्या हुआ? (5) क्या मैं भविष्य में होऊँगा?
(6) क्या मैं भविष्य में नहीं होऊँगा? (7) तब मैं क्या होऊँगा? (8) तब मैं कैसे
होऊँगा? (9) मैं किसमें से गुजर कर क्या होऊँगा? या पुनः आज यह स्वयं हैं
जिसके विषय में वह सन्देहशील है, और स्वयं से पूछता है- (1) क्या मैं हूँ?
(2) क्या मैं नहीं हूँ? (3) मैं क्या हूँ? (4) मैं कैसे हूँ? (5) यह प्राणी कहां
से आया? (6) यह गुजर कर किधर जायेगा?
अन्य लोगों ने सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में प्रश्न उठाये थे।
कुछ का कहना था, यह ब्रह्म द्वारा रचित था।
अन्य लोग कहते थे, यह स्वयं प्रजापति द्वारा आहुति देकर रचा गया था।
दूसरे आचार्यों के पास उठाने के लिये दूसरेः ‘‘अनन्त है? संसार अनन्त नहीं
है? संसार सीमित है? संसार असीमित है? शरीर ही जीवन (जीव) है? शरीर
एक वस्तु है और जीवन-जीव दूसरी? सत्य-ज्ञाता (तथागत) मरणोपरान्त विद्यमान
रहते हैं? तथागत मरणोपरान्त विद्यमान नहीं रहते हैं? तथागत मरणोपरान्त विद्यमान