7. कर्म के ग्रंथों का वाचन मात्रा अ-धम्म है। - Page 276

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रहते हैं और विद्यमान नहीं रहते हैं? वे रहते भी हैं और नहीं भी रहते? वे

मरणोपरान्त न तो विद्यमान रहते हैं और न विद्यमान नहीं रहते हैं।’’ 7. बुद्ध का कहना था कि ऐसे प्रश्न विकृत मस्तिष्क लोगों द्वारा ही पूछे जा सकते

हैं।

  1. बुद्ध ने ऐसे धार्मिक सिद्धान्तों का खण्डन क्यों किया? इसके तीन कारण थे।
  2. सबसे पहला कारण तो यही था, कि उन्हें धर्म का अंग बनाने की कोई तुक

नहीं थी।

  1. दूसरा कारण यह था, कि इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिये ‘सर्वज्ञ’ की आवश्यकता

थी, जो कोई होता ही नहीं। उन्होंने अपने उपदेशों में इसी पर जोर दिया था। 11. उन्होंने कहा कि एक समय और उसी समय, कोई भी प्रत्येक वस्तु को न तो

जान सकता है और न देख सकता है। ज्ञान का कभी भी अन्त नहीं। सदैव ही

कुछ न कुछ और अधिक जानने को रहेगा ही।

  1. इन सिद्धान्तों के विरुद्ध तीसरा तर्क था कि वे केवल कल्पनाश्रित थे। न तो

सत्यापित किये गये और न ही उनकी सत्य-परीक्षा ही हो सकती थी। 13. वे कल्पना के घोड़ों के बेलगाम होने के परिणाम थे। उनके पीछे कोई वास्तविकता

नहीं थी।

  1. इसके अलावा कल्पानाश्रित सिद्धान्तों का एक दूसरे मनुष्यों के आपसी सम्बन्ध

में क्या प्रयोजन था? एक दम कुछ भी नहीं।

  1. भगवान बुद्ध यह नहीं विश्वास करते थे कि संसार की रचना की गयी है। वह

विश्वास करते थे कि संसार का विकास हुआ है।

7. धर्म के ग्रंथों का वाचन-मात्र अ-धम्म है

  1. ब्राह्मणों ने अपना पूरा जोर ‘ज्ञान’ पर दिया है। उन्होंने शिक्षा दी कि ‘ज्ञान’ की

प्रत्येक वस्तु का ‘अथ’ और ‘इति’ है। इससे आगे कुछ भी नहीं समझा जाता

था।

  1. दूसरी ओर बुद्ध सभी के लिये शिक्षा के समर्थक थे। इसके अतिरिक्त, उन्हें

चिन्ता थी कि मनुष्य ज्ञान का उचित उपयोग कैसे करता है? उनकी शिक्षा ज्ञान

के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा के उपयोग के लिए थी।