248 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- अतः वे इस बात पर सावधानीपूर्वक जोर देते थे कि जिसके पास ज्ञान है
उसके पास शील भी अवश्य होना चाहिये, क्योंकि शील से रहित ज्ञान अत्यन्त
खतरनाक था।
- भिक्षु पटिसेन को जो उन्होंने कहा उससे प्रज्ञा के मुकाबिले शील का महत्व
भली-भाँति स्पष्ट होता है।
- प्राचीन समय में जब बुद्ध श्रावस्ती में निवास कर रहे थे, उस समय पटिसेन
नाम का एक वृद्ध भिक्षु, जो स्वभाव से कूढ़-मगज होने के कारण इतना भी
नहीं सीख सकता था कि एक गाथा भी मन से याद कर सके। 6. तदनुसार बुद्ध ने पांच सौ अर्हतों को प्रतिदिन उसे शिक्षा देने के लिए कहा था,
किन्तु तीन वर्ष पश्चात् भी वह यहां तक कि एक गाथा भी याद नहीं कर सका
था।
- तब जनपद के सभी लोग (लोगों के चारों प्रकार-भिक्षु, भिक्षुणियाँ, उपासक
और उपासिकायें) उसकी अज्ञानता को जानकर, उसकी हँसी उड़ाने लगे। तब
बुद्ध ने उस पर दया करके उसे एक ओर बुलाया और कोमलता से निम्नलिखित
गाथा कहीः
कायेन संवरो साधु, साधु वाचाय संवरो
मनसा संवरो साधु, साधु सब्बत्व संवरो
सब्बत्थ संवुतो भिक्खु सब्ब दुक्खा पमुच्चति
‘‘वह जो अपने मुंह को संयत रखता है, और अपने विचारों को संयत रखता
है, जो अपने शरीर द्वारा विरुद्ध आचरण नहीं करता, वह व्यक्ति जो इस प्रकार
आचरण करता है, निर्वाण को प्राप्त करता है।’’
- जब पटिसेन, अपने प्रति तथागत की करुणा की भावना से प्रभावित हुआ,
उसने अनुभव किया उसका मन खुल गया है, और एक बार उसने वह गाथा
दोहरायी।
- तब बुद्ध ने उसे आगे सम्बोधित किया, ‘‘हे वृद्ध! तुम अब केवल एक गाथा
को दोहरा सकते हो, और लोग इसे जानते हैं, और वे अब भी तुम्हारी हँसी
उड़ायेंगे, अतः मैं अब तुम्हें गाथा का अर्थ स्पष्ट करता हूँ, तुम ध्यानपूर्वक
सुनो।’’
- तब बुद्ध ने शरीर से सम्बन्धित तीन अकुशल कर्म, वाणी से सम्बन्धित चार