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अकुशल कर्म और मन से सम्बन्धित तीन अकुशल कर्म समझाए इन दस अकुशल
कर्मों को त्याग करके मनुष्य निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं, जिसके आधार पर
भिक्षु को सत्य का बोध हो गया और वह अर्हत्व पद का लाभी हुआ।
- अब, इसी समय, विहार में पांच सौ भिक्षुणियां निवास कर रही थीं, जिन्होंने
अपने में से एक को बुद्ध के पास प्रार्थना करने के लिये भेजा कि वे किसी
भिक्षु को उन्हें धर्म का निर्देश देने के लिए भेज दें।
- उनकी प्रार्थना सुनकर बुद्ध ने इस उद्देश्य के लिये उनके पास वृद्ध भिक्षु पटिसेन
को भेजना चाहा।
- यह जानकर कि वह व्यवस्था की गयी है, सभी भिक्षुणियों ने एक साथ हँसना
शुरू कर दिया, और तय किया कि कल, जब वे आयेंगे, वे गाथा का उल्टा
उच्चारण कर वृद्ध भिक्षु को भ्रमित करेंगी और उसे शर्मिन्दा करेंगी। 14. तब दूसरे दिन जब वह आये, तो बड़ी और छोटी सभी भिक्षुणियाँ प्रणाम करने
को आगे बढ़ीं और अभिवादन कर उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा और
मुस्करायीं।
- तब बैठने के उपरान्त, उन्होंने उसे भोजन प्रस्तुत किया। भोजन कर लेने और
अपने हाथ धो लेने के बाद, उन्होंने उससे अपना उपदेश आरम्भ करने की
प्रार्थना की। जिस पर वृद्ध भिक्षु ने धर्मासन ग्रहण किया और बैठते हुए, प्रारम्भ
कियाः
- ‘‘बहनो! मेरी योग्यता कम है, मेरा ज्ञान अत्यन्त कम है। मैं केवल एक ही
गाथा जानता हूँ, किन्तु मैं उसको दोहराऊँगा और उसका अर्थ स्पष्ट करूँगा।
तुम ध्यानपूर्वक सुनो और समझो।’’
- तब सभी युवा भिक्षुणियों ने गाथा को उल्टे क्रम से कहने का प्रयास किया,
लेकिन यह क्या वे अपने मुँह को नहीं खोल सकीं, और लज्जा से मर गईं
उन्होंने दुख से अपने सिर नीचे लटका लिये।
- तब पटिसेन ने गाथा को दोहराने के पश्चात् उसको स्पष्ट करना प्रारम्भ कर
दिया, जैसा कि भगवान बुद्ध ने उन्हें समझाया था।
- तब सभी भिक्षुणियाँ उसके वचन सुनकर, आश्चर्य से भर गयीं, और इस प्रकार
के उपदेश सुनकर प्रसन्न होते हुए, उसे एकाग्र चित्त से ग्रहण किया, और वे
अर्हत बन गयीं।
- इसके बाद अगले दिन, राजा प्रसेनजति ने बुद्ध और सम्पूर्ण भिक्षु संघ को अपने