250 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
महल में भोजन के लिये आमंत्रित किया।
- अतः भगवान बुद्ध ने पटिसेन की श्रेष्ठ योग्यता को पहचान कर, उसे अपना
भिक्षा पात्र लेकर साथ-साथ चलने के लिए कहा।
- किन्तु जब वे राजमहल के द्वार पर पहुँचे, द्वारपाल ने जो उनसे पूर्व परिचित
था, उसने यह कहते हुए उन्हें भीतर महल में जाने नहीं दिया, ‘‘हमारे पास ऐसे
भिक्षु के लिए आधित्य नहीं है, जो केवल एक गाथा ही जानता हो, आपके
जैसे सामान्य व्यक्तियों के लिये यहां कोई स्थान नहीं है। अपने से श्रेष्ठ लोगों
के लिये रास्ता छोड़ें और हट जायें।’’
पटिसेन तदनुसार द्वार के बाहर ही बैठ गये।
अब बुद्ध ने आसन ग्रहण किया, अपने हाथ धो लेने के पश्चात्, और लो!
भिक्षा पात्र अपने हाथ में लिये हुए पटिसेन का हाथ वहां उपस्थित था।
- तब राजा, मंत्री और संपूर्ण उपस्थित जनों ने यह दृश्य देखा और आश्चर्य से
भर गये, और कहा, ‘‘ओह! यह कौन हैं?’’
- जिस पर बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘यह भिक्षु पटिसेन है। इसने अभी बोधि प्राप्त
की है, और मैंने उससे अपने पीछे-पीछे मेरा भिक्षा पात्र लेकर आने को कहा
था, किन्तु द्वारपाल ने उन्हें प्रवेश नहीं करने दिया।’’
इस पर पटिसेन प्रवेश मिल गया और संघ में सम्मिलित हुए।
बुद्ध की ओर अभिमुख होकर तब प्रसेनजित ने कहा, ‘‘मैंने सुना है कि इस
पटिसेन की कुछ योग्यता नहीं है और केवल एक ही गाथा जानते हैं, तब उसे
सर्वोच्च बोधि कैसे प्राप्त हो गई?’’
- भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया, ‘‘ज्ञान अधिक होने की आवश्यकता नहीं है, शील
मुख्य गुण है।’’
- ‘‘इस पटिसेन ने इस एक गाथा के मर्म को अच्छी तरह हृदयंगम कर लिया है।
इनके शरीर, वाणी और विचार सम्पूर्ण रूप से शांत हो गए हैं, क्योंकि यद्यपि
एक मनुष्य बहुत अधिक जानता हो, किन्तु यदि उसका आचरण तदनुसार नहीं है,
तो वह सारा ज्ञान उस आदमी को विनाशोन्मुखी होने से नहीं बचा सकता।’’
तब बुद्ध ने कहाः
‘‘यद्यपि कोई मनुष्य एक हजार गाथाओं का वाचन करे, किन्तु उन गाथाओं
का अर्थ नहीं समझे, तो उसका वह वाचन भली-भाँति समझी गयी एक गाथा