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के वाचन के समान नहीं है, जिसे सुनकर अपने को नियन्त्रित या शान्ति को
प्राप्त हो। बिना समझे हजारों शब्दों के उच्चारण में क्या लाभ है? किन्तु एक
शब्द को समझना और उसको सुनना, तदनुसार आचरण करना, यह मुक्ति प्राप्त
करने के लिये है।’’
- ‘‘एक मनुष्य अनेक ग्रन्थों का वाचन कर सकता है किन्तु यदि वह उनकी
व्याख्या नहीं कर सकता है, तो उसे क्या लाभ है? किन्तु धम्म के एक वाक्य
की व्याख्या करना और तदनुसार आचरण करना, यही सर्वोच्च प्रज्ञा या बोधि
पाने का मार्ग है।’’
- इन शब्दों को सुन कर, दो सौ भिक्षु, राजा और उनके मंत्री सभी आनन्द से
परिपूर्ण हो गये।
8 धर्म-ग्रन्थों को गलती की सम्भावना से परे मानना अ-धम्म है।
- ब्राह्मणों ने घोषणा की हुई थी कि वेद न केवल पवित्र ही हैं, बल्कि सत्ता के
प्रश्न पर वे स्वतः प्रमाण हैं।
- ब्राह्मणों द्वारा वेद न केवल स्वतः प्रमाणित घोषित किये गये बल्कि उन्होंने उन्हें
अपौरुषेय होने के कारण गलती की सम्भावना से परे माना।
इस विषय पर बुद्ध ब्राह्मणों के सर्वथा विरुद्ध थे।
उन्होंने अस्वीकार किया कि वेद पवित्र हैं। उन्होंने वेदों को स्वतः प्रमाण एवं
आपौरुषेय नहीं माना और उन्होंने वेदों को गलती की सम्भावना से परे नहीं
माना।
- उनके समकालीन कई दूसरे धर्मोपदेशकों का भी यही मत था। बाद में उन्होंने
या उनके अनुयायियों ने भी दर्शन की अपनी व्यवस्थाओं को ब्राह्मणों से आदर
एवं सद्भाव प्राप्त करने के लिए अपना पक्ष पूर्णतया छोड़ दिया था किन्तु बुद्ध
इस विषय पर कभी नहीं झुके थे।
- तेविज्ज सुत्त से भगवान बुद्ध ने कहा था कि वेद एक जल-रहित मरूस्थल,
एक पथविहिन जंगल और वास्तव में विनाश-पथ हैं। बौद्धिक और नैतिक प्यास
वाला कोई भी मनुष्य अपनी प्यास बुझाने की आशा से वेदों के पास नहीं जा
सकता है।
- वेदों में गलती की सम्भावना के सम्बन्ध में, उन्होंने कहा कोई ऐसी चीज हो