252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
ही नहीं सकती, जो भ्रमाती नहीं है, यहाँ तक कि वेद भी नहीं। उन्होंने कहा,
प्रत्येक सिद्धान्त व वस्तु अवश्य ही परीक्षण और पुनर्परीक्षण के अधीन होनी
चाहिये।
यह उन्होंने कालाम लोगों को अपने उपदेश में स्पष्ट किया है।
एक बार तथागत, एक विशाल भिक्षु संघ सहित कोसल जनपद से होकर गुजरते
हुए केसपुत्त नगर में आये, जिसमें कालाम लोग निवास करते थे
- जब कालाम लोगों को उनके आगमन के विषय में ज्ञात हुआ, तो वे स्वयं वहां
पहुंचे जहाँ तथागत थे और एक ओर बैठ गये। इस प्रकार सपुत्त के कालाम
लोग तथागत से इस प्रकार बोलेः
- ‘‘श्रमण! गौतम ऐसे कुछ तपस्वी और भिक्षु हैं, जो केसपुत्त आते हैं और जो
स्वयं अपने मतों पर प्रकाश डालते हैं और अपनी-अपनी प्रशंसा करते हैं, किन्तु
वे दूसरों के मतों का खण्डन करते हैं, नीचा दिखाते हैं, निन्दा और विरोध
करते हैं। और ऐसे अन्य तपस्वी और भिक्षु भी हैं, तथागत्, जो केसपुत्त आते
हैं, और वे भी स्वयं अपनी धारणाओं को प्रतिपादित और अतिरंजित करते हैं,
किन्तु दूसरों की धारणाओं को ध्वस्त, दमित और तिरस्कृत करते हैं और दूसरे
के मत को नीचा दिखाते हैं।’’
- ‘‘हे श्रमण गौतम! और इसीलिये हम अनिश्चय और सन्देह में हैं, यह न जानते
हुए कि इन श्रमणों में से कौन सत्य बोलता है और कौन झूठ।’’
- तथागत ने कहा, ‘‘निस्सन्देह, अनिश्चित और संदेह होने के लिये कालाम लोगों
तुम्हारे पास अच्छा कारण है, वस्तुतः ठीक अवसर पर तुम में अनिश्चय और
सन्देह उत्पन्न हुआ है।’’
- तथागत ने आगे कहा, ‘‘आओ, हे कालामों! जो कुछ तुमने सुना है केवल उस
पर मत जाओ, जो कुछ परम्परा से प्राप्त हुआ और बहुतों द्वारा कहा गया केवल
उस पर मत जाओ, जो धर्मग्रन्थों में लिखा प्राप्त हुआ है केवल उस पर मत
जाओ, तर्कशास्त्र की निपुर्णता पर मत जाओ, केवल न्यायशास्त्र पर आधारित
विचारों पर ही मत जाओ, अनुकूल धारणाओं और मतों पर ही केवल मत
जाओ, जो प्रामाण्कि प्रतीत होता है केवल उस पर मत जाओ, कुछ श्रमणों या
श्रेष्ठ लोगों के द्वारा कहीं हुई बातों पर ही मत जाओ।’’
- ‘‘तब, फिर हमें क्या करना चाहिये? हमें कौन सी कसौटी अपनानी चाहिये?’’
कालामों ने पूछा।