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2. संसार को धम्म-राज्य बनाना
धर्म का क्या उद्देश्य है?
विभिन्न धर्मों ने इसके भिन्न-भिन्न उत्तर दिये हैं।
मनुष्य को ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर लगाना और उसे अपनी आत्मा को बचाने
के महत्त्व को सिखलाना, इस प्रश्न का एक सामान्य उत्तर मिलता है।
अधिकतर धर्म तीन राज्यों की चर्चा करते हैं।
एक स्वर्ग का राज्य कहलाता है। दूसरा पृथ्वी का राज्य कहलाता है। तीसरा
नरक का राज्य कहलाता है।
- यह स्वर्ग का राज्य ईश्वर द्वारा शासित कहा जाता है। नरक का राज्य एक ऐसा
स्थान वर्णित किया गया है, जहां शैतान की संप्रभुता निर्विरोध है। पृथ्वी का
राज्य एक विवादित क्षेत्र है। यह शैतान के प्रभुत्व के अधीन नहीं है। साथ ही
साथ ईश्वर की संप्रभुता भी इस पर विस्तारित नहीं है। यह आशा की जाती है
कि किसी दिन यह हो जाये।
- कुछ धर्मों में स्वर्ग का राज्य एक ऐसा राज्य कहा जाता है, जिसमें धर्म-परायण्
ाता प्रबल होती है। निस्संदेह क्योंकि वह सीधे ईश्वर द्वारा शासित है।
- कुछ दूसरे धर्मों में स्वर्ग का राज्य पृथ्वी पर नहीं है। यह स्वर्ग का एक दूसरा
नाम है जो ईश्वर और उसके पैगम्बर पर ईमान लाता है। यहां तक वही पहुंच
सकता है, जब वह स्वर्ग पहुँचता है और उनमें श्रद्धा रखता है तो जीवन के
सभी भौतिक सुख उन तक पहुंचा दिये जाते हैं।
- सभी धर्म प्रतिपादित करते हैं कि स्वर्ग के इस राज्य तक पहुँचना मनुष्य का लक्ष्य
होना चाहिये और वहां तक कैसे पहुंचा जाये, यही सब-कुछ का अन्त है।
‘‘धर्म का क्या उद्देश्य है?’’ इस प्रश्न पर बुद्ध ने सर्वथा भिन्न उत्तर दिया है।
भगवान बुद्ध लोगों को यह नहीं कहते कि जीवन में उनका लक्ष्य किसी
काल्पनिक स्वर्ग तक पहुंचना होना चाहिये। धर्मपरायण राज्य पृथ्वी पर ही है
और वह मनुष्य द्वारा धर्मपरायण आचरण करके प्राप्त किया जा सकता है।
- उन्होंने लोगों को बताया कि यदि तुम अपने दुख का अन्त करना चाहते हो, तो
प्रत्येक को दूसरों के साथ न्याय-संगत, धर्म-संगत, व्यवहार करना होगा, तभी
यह पृथ्वी धर्मपरायण राज्य बन सकेगी।