2. संसार को एक धम्म-‘राज्य’ बनाना। - Page 289

260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. यही है, जो उनके धम्म को अन्य सभी धर्मों से पृथक करता है।
  2. उनका धम्म पंचशील, आष्टांगिक मार्ग और पारमिताओं पर जोर देता है।
  3. बुद्ध ने इनको अपने धम्म का आधार क्यों बनाया? क्योंकि वे एक जीवन शैली

को संस्थापित करते हैं, केवल यही मनुष्य को धर्मपरायण बना सकती है। 16. मनुष्य-मनुष्य के प्रति अनुचित-व्यवहार का परिणाम ही मनुष्य के दुख का

कारण है।

  1. मनुष्य का मनुष्य के प्रति जो अनुचित व्यवहार है, उसका नाश केवल धम्म ही

कर सकता है और उससे उत्पन्न दुख का भी।

  1. इसीलिये भगवान बुद्ध ने कहा कि धर्म का काम केवल उपदेश देना ही नहीं

है, बल्कि जैसे भी हो मनुष्य के मन में यह बात बिठानी है कि सर्वोपरि

आवश्यकता सदाचारी बनने की है।

  1. उन्होंने कहा कि धर्मपरायणता को मन में बैठाने के उद्देश्य से धर्म के लिए

आवश्यक है कि वह कुछ दूसरे कार्य भी करे।

  1. धर्म मनुष्य को यह शिक्षा देनी चाहिए कि कुशल कर्म कौन सा जिससे उसका

अनुसरण करने के लिये कुशल कर्म करे।

  1. धर्म मनुष्य को यह यह दीक्षा देनी चाहिए कि अकुशल कर्म कौन सा है और

उसका अनुसरण न करे, जिससे वह अकुशल कर्म करने से बच सके। 22. धर्म के इन उद्देश्यों के अतिरिक्त उन्होंने दो अन्य उद्देश्यों पर भी जोर दिया

जिन्हें वे सर्वोच्च महत्त्व प्रदान करते थे।

  1. पहला मनुष्य का सहज स्वभाव और उसकी प्रवृत्तियों का प्रशिक्षण, जो प्रार्थना

करने, व्रत आदि रखने या यज्ञ-बलि इत्यादि से भिन्न प्रक्रिया है। 24. इसे भगवान बुद्ध ने देवदह सुत्त में जैन धर्म की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया

है।

  1. जैन धर्म के संस्थापक महावीर का कहना था कि जो भी व्यक्तिगत अनुभव

होते हैं, भले ही वे सुखद हों या दुखद, सभी पूर्व जन्मों में किए गये कर्मों का

परिणाम होते हैं।

  1. ऐसा होने पर पूर्व जन्म के दुष्कर्मों के निर्जरा हो जाने से और नए दुष्कर्म न

करने से, भविष्य के लिये कुछ संग्रह नहीं होता। जब भविष्य के लिये कुछ