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संग्रह नहीं होता, तो दुष्कर्मों का क्षय हो जाता है। जब दुष्कर्मों का क्षय हो
जाता है, तो दुखों का भी क्षय हो जाता है। जब दुखों का क्षय हो जाता है, तो
सुख-दुख अनुभव करने की शक्ति (वेदना) का भी क्षय हो जाता है। और जब
वेदना का क्षय हो जाता है, तो सभी दुखों का क्षय हो जाता है और वे समाप्त
हो जाते हैं।
यही जैन धर्म (के निगण्ठनाथ) की शिक्षा थी।
इस पर भगवान बुद्ध ने यह प्रश्न पूछा, ‘‘क्या तुम जानते हो कि यहाँ ही और
अब ही, अकुशल प्रवृत्तियों से छुटकारा मिल गया और कुशल प्रवृत्तियाँ अर्जित
हो गयीं?’’
उत्तर था, ‘‘नहीं’’।
तब भगवान बुद्ध ने पूछा, ‘‘पूर्वजन्म के दुष्कर्मों की निर्जरा से और नये दुष्कर्मों
को न करने से क्या लाभ है यदि चित्त को इसका अभ्यास नहीं है कि अकुशल
प्रवृत्तियों को कुशल प्रवृत्तियों में बदला जा सके।’’
- जैन धर्म के विचार से धर्म में यह सबसे गम्भीर त्रुटि थी। कुशल प्रवृत्ति या शुभ
संस्कार ही केवल स्थायी कल्याण का स्थायी आधार और गारण्टी हो सकती
है।
- इसीलिए भगवान बुद्ध ने मन के प्रशिक्षण को पहला स्थान दिया है, जो कि
एक मनुष्य की प्रवृत्तियों के प्रशिक्षण के समान ही है।
- दूसरी बात जिसे तथागत ने विशेष महत्त्व दिया वह यह है कि मनुष्य में इस
बात का साहस हो कि चाहे कोई अकेला ही क्यों न हो, तब भी उचित मार्ग
से विचलित न हो।
सल्लेख सुत्त में भगवान बुद्ध ने इसी बात पर जोर दिया है।
उन्होंने कहा हैंः
‘‘यह निश्चय करके तुम्हें अपने मन को निर्मल बनाने के लिए निश्चय करना
चाहिए कि यद्यपि अन्य लोग हानि करें मैं हानि नहीं करूंगा।’’
‘‘यद्यपि अन्य लोग हिंसा करें मैं हिंसा नहीं करूंगा।’’
‘‘यद्यपि अन्य लोग चोरी करें मैं चोरी नहीं करूंगा।’’
‘‘यद्यपि अन्य लोग श्रेष्ठ जीवन व्यतीत नहीं करें, मैं श्रेष्ठ जीवन व्यतीत
करूंगा।’’