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परिच्छेद दो
(ख) धम्म तभी सद्धम्म हो सकता है, जब वह प्रज्ञा की वृद्धि करे 1. धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह सभी के लिये ज्ञान के द्वार खोल दे
- ब्राह्मणवादी सिद्धांत था कि ज्ञानार्जन सभी के लिये नहीं खोला जा सकता है।
यह अनिवार्य रूप से कुछ लोगों के लिये ही सीमित रहना चाहिये। 2. उन्होंने केवल ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के लिये ज्ञानार्जन की अनुमति दी
थी, किन्तु यह केवल इन तीन वर्गों के पुरुषों के लिये ही थी। 3. सभी स्त्रियाँ, भले ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग से क्यों न सम्बन्धित
हों, और सभी शूद्रों-पुरुष और स्त्रियाँ-दोनों के लिये ज्ञान अर्जित करना, यहाँ
तक कि साक्षरता अर्जित करना निषिद्ध था।
- बुद्ध ने ब्राह्मणों के इस नृशंस सिद्धांत के विरुद्ध एक विद्रोह उत्पन्न किया।
- उन्होंने उपदेश दिया कि ज्ञान-प्राप्ति का मार्ग अवश्य ही सबके लिये, पुरुषों के
साथ ही साथ स्त्रियों के लिए भी, खुला होना चाहिये।
- अनेक ब्राह्मणों ने तथागत के दृष्टिकोण का खण्डन करने का प्रयास किया।
ब्राह्मण लोहिच्च के साथ उनका विवाद उनके दृष्टिकोणों पर पर्याप्त प्रकाश
डालता है।
- तथागत, जब एक बार बहुत बड़े भिक्षु संघ के साथ कोशल जनपद से चारिका
करते हुए गुजर रहे थे, साल वृक्षों की कतार से घिरे सालवाटिका नामक एक
गाँव में पहुँचे।
- उस समय, लोहिच्च ब्राह्मण सालवाटिका में रहता था, जो जीवन से भरपूर,
घास, जंगल और धन-धान्य से परिपूर्ण था। यह शाही भेंट के रूप में कोशल
के राजा प्रसेनजित् द्वारा उसे एक शाही तौर पर दिया गया था, ऐसे अधिकार
सहित मानो वह वहाँ का राजा था।
- लोहिच्च ब्राह्मण का मत था कि यदि किसी श्रमण या ब्राह्मण ने ज्ञान अर्जित
कर लिया है, तो वह उसे स्त्रियों या शूद्रों को प्रदान न करे। 10. तब लोहिच्च ब्राह्मण ने सुना कि तथागत सालवाटिका में ठहरे हुए हैं। 11. यह सुनकर उसने भेसिक नामक नाई को बुलाकर उस से कहाः ‘‘आओ, भले
भेसिक!’’ वहाँ जाओ जहाँ श्रमण गौतम ठहरे हुए हैं, और अपने पहुँचने पर,