264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
मेरी तरफ से उनका कुशल-क्षेम पूछाना कि उन्हें कोई तकलीफ और परेशानी
तो नहीं है। क्या वे स्वस्थ, और आराम की अवस्था में हैं? और इस प्रकार
कहना।’’
‘‘आदरणीय गौतम, भिक्षुसंघ सहित कृपया कल का भोजन ब्राह्मण लोहिक्क द्वारा
स्वीकार करें।’’
‘‘बहुत अच्छा, श्रीमान्,’’ नाई ने कहा।
लोहिच्च ब्राह्मण का कथन स्वीकार कर, उसने वही किया, जो उसे करने के लिये
कहा गया था। तथागत ने मौन रहकर उसकी प्रार्थना को स्वीकार किया। 14. दूसरे दिन प्रातः काल तथागत चीवर ग्रहण कर, पात्र चीवर ले भिक्षु-संघ सहित
सालवाटिका की ओर पधारे।
- भेसिक नामक नाई को लोहिच्च द्वारा तथागत को लाने के लिये भेजा गया था,
तथागत के पीछे कदम-दर-कदम चला आ रहा था। रास्ते में उसने तथागत को
बताया कि लोहिच्च ब्राह्मण की यह मिथ्या दृष्टि है कि किसी श्रमण या ब्राह्मण
को कोई ज्ञान या विद्या स्त्रियों और शूद्रों को नहीं प्रदान करना चाहिये। 16. ‘‘भेसिक! ऐसा हो सकता है, भेसिक! ऐसा हो सकता है,’’ तथागत ने उत्तर
दिया।
- और तथागत लोहिच्च ब्राह्मण के निवास-स्थान पर पहुँचे और अपने लिये तैयार
आसन पर बैठ गये।
- तब लोहिच्च ब्राह्मण ने भिक्षुसंघ सहित तथागत को प्रमुख रूप से स्वयं अपने
हाथों से मधुर भोज्य पदार्थ, परोसे, जब तक कि उन्होंने और अधिक के लिये
मना नहीं कर दिया।
- जब तथागत ने अपना भोजन समाप्त कर दिया, और पात्र तथा अपने हाथ धो लिये,
ब्राह्मण लोहिच्च एक नीचा आसन ले आया और उनके समीप बैठ गया। 20. इस प्रकार बैठे हुए उससे तथागत ने कहा, ‘‘क्या यह सत्य है, जैसा लोग कहते
हैं, लोहिच्च, कि तुम्हारा यह मत है कि किसी श्रमण या ब्राह्मण को कोई ज्ञान
या विद्या स्त्रियों और शूद्रों को नहीं प्रदान करनी चाहिये?’’ 21. ‘‘ऐसा ही है, गौतम,’’ लोहिच्च ने उत्तर दिया।
- ‘‘अब तुम क्या सोचते हो, लोहिच्च? क्या तुम सालवाटिका के मालिक नहीं
हो?’’ ‘‘हाँ, ऐसा ही है, गौतम!’’
- ‘‘तब मान लो, लोहिच्च, कि कोई इस प्रकार कहेः ‘‘ब्राह्मण लोहिच्च! का