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सालवाटिका पर अधिकार है। किसी दूसरे के लिये कुछ भी न छोड़ते हुए उसे
ही केवल सालवाटिका से प्राप्त समस्त कर और समस्त आनन्द लेने दो। क्या
यह बात कहने वाला व्यक्ति उन लोगों के लिये खतरनाक नहीं होगा, जो तुम
पर निर्भर करते हैं कि नहीं?’’
‘‘वह खतरनाक होगा, गौतम!’’
‘‘क्या वह ऐसा खतरा उत्पन्न करने वाला व्यक्ति हितचिन्तक समझा
जायेगा?’’
- ‘‘नहीं, वह उनका हित चाहने वाला नहीं होगा, गौतम!’’ लोहिच्च ने उत्तर
दिया।
‘‘और उनके हित का ध्यान न रखने वाला, क्या वह उसका मित्र होगा या शत्रु?’’
‘‘गौतम! शत्रु।’’
‘‘किन्तु जब किसी का हृदय शत्रुता से परिपूर्ण हो, तो क्या वह सिद्धांत ठीक
है, या गलत?’’
‘‘यह एक गलत सिद्धांत है, गौतम!’’
‘‘अब तुम क्या सोचते हो, लोहिच्च! क्या कोशल के राजा प्रसेनजित् का काशी
और कोसल पर अधिपत्य नहीं है?’’
‘‘हाँ, ऐसा ही है, गौतम!’’
‘‘तब मान लो, लोहिच्च!, कि कोई इस प्रकार कहे- कोसल के राजा प्रसेनजित्
का काशी और कोसल पर आधिपत्य है। उसे ही काशी और कोशल से प्राप्त
समस्त कर और समस्त उपज का आनन्द लेने दो, किसी दूसरे के लिये कुछ
भी न छोड़ते हुए तो क्या यह कहने वाला व्यक्ति उन लोगों के लिये जो कोसल
के राजा प्रसेनजित् पर निर्भर करते हैं-तुम्हारे और दूसरे लोगों सहित-खतरनाक
होगा कि नहीं?’’
‘‘गौतम! वह खतरनाक होगा।’’
‘‘और वह खतरा उत्पन्न कर, क्या वह एक ऐसा व्यक्ति होगा, जो उनके हित
के प्रति सहानुभूति रखता है?’’
‘‘वह उनका हित चाहने वाला नहीं होगा, गौतम!’’
‘‘और उनके हित का ध्यान न रखते हुए, क्या उसका हृदय उनके प्रति प्रेम से
परिपूर्ण होगा या शत्रुता से?’’