266 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
‘‘शत्रुता से, गौतम!’’
‘‘किन्तु जब किसी का हृदय शत्रुता से परिपूर्ण हो, तो क्या वह सिद्धांत गलत
है, या ठीक?’’
‘‘यह एक गलत सिद्धांत है, गौतम!’’
‘‘अतः तब, लोहिच्च, तुम स्वीकार करते हो कि जो यह कहे कि तुम्हें,
सालवाटिका पर आधिपत्य होने के कारण, तुम्हें समस्त कर और समस्त उपज
का आनन्द लेना चाहिये, किसी दूसरे के लिये कुछ नहीं छोड़ना चाहिये, और
वह जो कहे कि कोसल के राजा प्रसेनजित् काशी और कोसल पर अधिकार
होने के कारण, वे ही समस्त उपज का आनन्द उठायें, किसी दूसरे के लिये
कुछ भी नहीं छोड़ें, उन लोगों के लिये खतरनाक होगा, जो तुम पर निर्भर करते
हैं, या उनके लिये, तुम और अन्य लोग, जो राजा पर निर्भर करते हैं, जो इस
प्रकार दूसरों के लिये खतरा उत्पन्न करे, उनके लिये सहानुभूति नहीं, बल्कि
उनके लिये अपने हृदय में शत्रुता होगी। किसी के लिये अपने हृदय में शत्रुता
रखना गलत सिद्धांत है।’’
- ‘‘तब वह उसी प्रकार है लोहिच्च! जो यह कहे कि किसी श्र्रमण या ब्राह्मण
को कोई ज्ञान या विद्या स्त्रियों और शूद्रों को नहीं प्रदान करनी चाहिये।’’
- ‘‘वह उसी प्रकार, दूसरों के मार्ग में रोड़े अटकाने वाला होगा और उनके हित
के लिये सहानुभूति से रहित होगा।’’
- ‘‘उनके हित के लिये सहानुभूति से रहित होने के कारण उसके हृदय में शत्रुता
स्थापित हो जायेगी और जो किसी के हृदय में शत्रुता स्थापित हो जाए, तो वह
सिद्धांत ही गलत है।’’
2. धम्म तभी सद्धम्म है जब वह यह शिक्षा देता है, कि केवल विद्वान होता पर्याप्त नहीं, इससे मनुष्य ‘पंडिताऊपन’ की ओर
अग्रसर हो सकता है
- एक बार जब भगवान बुद्ध कौसाम्बी जनपद के ‘सुस्वर’ नामक विहार में ठहर
कर एकत्रित लोगों को धर्मोपदेश दे रहे थे उस समय वहाँ एक ब्रह्मचारी रह
रहा था।
- उस ब्रह्मचारी को यह अभिमान था कि शास्त्रों के ज्ञान में वह अद्वितीय है और
वह शास्त्रार्थ में अपने समान किसी को भी नहीं समझता था। इसलिये वह जहाँ
कहीं भी जाता, अपने हाथ में एक जलती हुई मशाल ले जाता था।