3. धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह सिखाता है कि जिस चीज की आवश्यकता है वह प्रज्ञा है। - Page 296

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  1. एक दिन किसी नगर के एक बाजार में एक मनुष्य ने, उसे इस प्रकार देख

कर, उससे इस विचित्र आचरण का कारण पूछा, जिस पर उसने उत्तर दियाः 4. ‘‘संसार इतना अंधकारमय है, और मनुष्य इतने पथ-भ्रष्ट हैं, कि मैं जहाँ तक

कर सकता हूँ, वहाँ तक इसे प्रकाशवान करने के लिए यह मशाल लेकर चलता

हूँ।’’

  1. यह देखकर भगवान बुद्ध ने तुरन्त ब्रह्मचारी को सम्बोधित किया, ‘‘अरे! यह

किसलिये है? तुम उस मशाल को किसलिये लिए हुए हो?’’ 6. ब्रह्मचारी ने उत्तर दिया, ‘‘सभी मनुष्य अज्ञान और अन्धकार में इतने घिरे हुए

हैं, कि मैं उन्हें रास्ता दिखाने के लिये यह मशाल लेकर चलता हूँ।’’ 7. तब तथागत ने उससे पुनः पूछा, ‘‘क्या तुम इतने विद्वान हो कि तुम उन चार

विद्याओं के जानकार हो, जो शास्त्रों के मध्य पायी जाती हैं, अर्थात्, शब्द-विद्या,

नक्षत्र-विद्या, राज-विद्या और युद्ध-विद्या?’’

  1. ब्रह्मचारी को मजबूर होकर यह स्वीकार करना पड़ा कि उसे इनके विषय में

जानकारी नहीं है। उसने अपनी मशाल दूर फेंक दी, तब भगवान बुद्ध ने आगे

यह कहाः

  1. ‘‘यदि कोई मनुष्य, भले ही वह विद्वान हो या नहीं, वह दूसरों की उपेक्षा करता

है, स्वयं को इतना महान समझता है, तो वह उस अन्धे मनुष्य के समान है,

जो स्वयं अन्धा होकर दूसरों को मशाल दिखाता फिरता है। ’’

3. धम्म तभी सद्धम्म है जब वह सिखाता है, जिस चीज की आवश्यकता है वह ‘प्रज्ञा’ है

  1. ब्राह्मण ‘विद्या’ को ही बहुत बड़ी मूल्यावान समझते थे। उनके लिये मात्र ‘विद्वान’

व्यक्ति ही पूज्य था, भले ही वह व्यक्ति शीलवान व्यक्ति हो या न हो। 2. निस्सन्देह उन्होंने कहा कि एक राजा का सम्मान उसके अपने देश में होता है,

किन्तु एक विद्वान का सम्मान सम्पूर्ण संसार में होता हे। इससे यह ज्ञात होता

है कि एक विद्वान एक राजा से अधिक महान् होता है।

  1. भगवान बुद्ध ने ‘विद्या’ और ‘प्रज्ञा’ के मध्य एक भेद किया है, उन्होंने ‘प्रज्ञा’

को ‘विद्या’ से भिन्न माना है।

  1. यह कहा जा सकता है कि ब्राह्मणों ने भी प्रज्ञा और विद्या के मध्य एक भेद

किया है।