268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- यह सही हो सकता है, किन्तु बुद्ध की ‘प्रज्ञा’ और ब्राह्मणों की ‘प्रज्ञा’ में
जमीन-आसमान का अन्तर होता है।
- अंगुत्तर निकाय में दिये गये अपने उपदेशों में भगवान बुद्ध ने भली-भाँति इस
भेद को स्पष्ट किया है।
- एक विशेष अवसर पर तथागत राजगृह के समीप वेणुवनाराम के ‘कलन्दक-निवास’
में ठहरे हुए थे।
- उस अवसर पर मगध का एक बड़ा अमात्य वर्षकार ब्राह्मण तथागत से मिलने
आया और उनके पास आकर शिष्टता से उन्हें प्रणाम किया। कुशल-क्षेम पूछने के
उपरान्त एक ओर बैठ गया। बैठने के बाद वर्षकार ब्राह्मण ने तथागत से कहाः
- ‘‘श्रमण गौतम! यदि किसी आदमी में ये चार गुण हैं, तो हम उसे बड़ा
विद्वान समझते हैं, बड़ा आदमी मानते हैं। वे चार गुण क्या हैं?’’
- ‘‘इसमें, श्रमण गौतम! (1) वह विज्ञ होता है, जो कुछ भी वह सुनता है,
उसके सुनते ही तुरन्त वह उसके अर्थ को समझ लेता है, वह कह सकता है
कि उस कथन का यह अर्थ है। इसके अतिरिक्त, (2) उसकी स्मरण-शक्ति
अच्छी होती है, वह बहुत पहले की गयी और पहले कही गयी एक बात को
याद रख सकता है और पुनः प्रस्तुत कर सकता है।’’
- ‘‘पुनः तथागत ने कहा- (3) एक गृहस्थ के सभी कार्यों में वह निपुण और
परिश्रमी है, और दृष्टि से (4) वह यह जानने में चतुर और सक्षम है कि क्या
करना उचित है, क्या व्यवस्था की जानी चाहिये।’’
- ‘‘तब, श्रमण गौतम! यदि एक मनुष्य में ये गुण हैं, तो हम उसे विद्वानों में से
एक महान् विद्वान मनुष्य प्रमाणित करते हैं। गौतम! यदि आप मेरे कथन का
समर्थन करना उचित समझते हैं, तो मेरा समर्थन करें। इसके विपरीत, यदि
खण्डन करने योग्य समझते हैं, तो मेरा खण्डन करें।’’
- ‘‘अच्छा, ब्राह्मण! इसमें मैं न तो तुम्हारा समर्थन करता हूँ और न ही तुम्हारा खंडन
करता हूँ। मैं स्वयं उस मनुष्य को विद्वान समझता हूँ, यदि उसमें निम्नलिखित
चार गुण हैं, जोकि तुम्हारे द्वारा बताये गये गुणों से सर्वथा भिन्न हैं।’’
- ‘‘हे ब्राह्मण! एक मनुष्य बहुत जनों के हित के लिये और बहुत जनों के कल्याण
के लिये समर्पित है। उसके द्वारा बहुत लोग आर्य-मार्ग पर स्थापित हैं, अर्थात्
वह एक सुन्दर स्वभाव का है, वह हित कर स्वभाव का है।’’
- ‘‘जिस किसी विषय में वह अपने मन को लगाना चाहता है, उस विषय में
वह अपने मन को लगा लेता है। जिस किसी विषय में वह अपने मन को नहीं