3. धम्म तभी सद्धम्म है, जब वह सिखाता है कि जिस चीज की आवश्यकता है वह प्रज्ञा है। - Page 298

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लगाना चाहता, उस विषय में वह अपने मन को नहीं लगाता है।’’ 16. ‘‘जिस किसी संकल्प को वह मन में ठान लेना चाहता है, उस विषय में वह

मन को लगा सकता है। जिस संकल्प को मन में उत्पन्न होने नहीं देना चाहता

है, उसे उत्जेना नहीं होने देता। इस प्रकार वह अपने मन पर और अपने विचारों

पर अधिकार रखता है।’’

  1. ‘‘साथ ही वह जब चाहे बिना किसी कठिनाई के और बिना किसी विघ्न के

चारों लोकोत्तर ध्यानों को प्राप्त कर सकता है, जो कि इसी जीवन में सुख-विहार

के लिए हैं।’’

  1. ‘‘साथ ही इसी जीवन में पूर्णतया आस्रवों के क्षय करके वह चित्त की विमुक्ति

प्राप्त करता है, प्रज्ञा द्वारा विमुक्ति को प्राप्त कर इसमें विहार करता है।’’ 19. ‘‘इसलिये हे ब्राह्मण! इसमें न तो मैं तुम्हारा समर्थन करता हूँ और न ही तुम्हारा

खण्डन करता हूँ, बल्कि मैं उस मनुष्य को विद्वान और बड़ा आदमी समझता

हूँ, जिसमें ये चार गुण हैं, जो तुम्हारे बताए गुणों से सर्वथा भिन्न हैं।’’ 20. ‘‘यह अद्भुत है, श्रमण गौतम! यह आश्चर्यजनक है, श्रमण गौतम! आपने यह

कितनी अच्छी तरह स्पष्ट किया है!’’

  1. ‘‘मैं स्वयं समझता हूँ कि गौतम! ये समान रूप से चारों गुण योग्य हैं। निस्संदेह,

श्रमण गौतम! बहुत जनों के हित, कल्याण के लिए अर्पित हैं। उनके द्वारा बहुत

लोग आर्य-मार्ग पर स्थापित हैं। अर्थात्, वह जो एक सुंदर स्वभाव का है, वह

एक हितकर स्वभाव का है, स्थापित किए गए हैं।’’

  1. ‘‘निस्सन्देह, श्रमण गौतम! जिस किसी विषय में वे अपने मन को लगाना चाहते

हैं, उस विषय में वे अपने मन को लगा सकते हैं...... निश्चय ही उन्हें अपने

मन और विचारों पर अधिकार होता है।’’

  1. ‘‘निश्चय ही श्रमण गौतम! जब चाहे बिना कठिनाई के, बिना तकलीफ के.

.....चारों लोकोत्तर ध्यानों को....... निश्चय ही श्रमण गौतम आस्रवों के क्षय

का......... चित्त की विमुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, प्रज्ञा द्वारा विमुक्ति और इसे

प्राप्त कर इसमें विहार करते हैं।’’

  1. इसमें बहुत ही स्पष्ट शब्दों में बुद्ध द्वारा प्रतिपादित प्रज्ञा और ब्राह्मणों के अनुसार

प्रतिपादित प्रज्ञा के मध्य के भेद को स्पष्ट किया गया है।

  1. इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि भगवान बुद्ध विद्या की अपेक्षा प्रज्ञा को

क्यों अधिकार महत्त्व देते थे।