1. धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह शिक्षा देता है कि मात्र प्रज्ञा ही पर्याप्त नहीं है इसके साथ शील का होना अनिवार्य है। - Page 299

270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

परिच्छेद तीन

धम्म तभी सद्धम्म हो सकता है, जब वह मैत्री की वृद्धि करे 1. धम्म केवल तभी सद्धम्म है, जब वह यह शिक्षा दे कि मात्र प्रज्ञा ही पर्याप्त नहीं है, इसके साथ शील का होना अनिवार्य है।

  1. प्रज्ञा आवश्यक है, किन्तु शील अधिक आवश्यक है। शील के बिना प्रज्ञा

खतरनाक हो जाती है।

  1. अकेली प्रज्ञा खतरनाक है।

  2. प्रज्ञा मनुष्य के हाथ में दुधारी तलवार के समान होती है।

  3. शीलवान मनुष्य के हाथ में होने पर यह खतरे में पड़े मनुष्य की रक्षा में प्रयोग

की जा सकती है।

  1. किन्तु एक शीलरहित मनुष्य के हाथ में होने पर यह हत्या के लिये प्रयोग की

जा सकती है।

  1. इसलिये शील, प्रज्ञा से अधिक महत्त्वपूर्ण होती है।

  2. प्रज्ञा, विचार-धम्म या सम्यक् विचार करना है। शील, आचार-धम्म है, सम्यक्

आचरण।

  1. बुद्ध ने शील के सम्बन्ध में पाँच मूल सिद्धांत निर्धारित किये हैं।

  2. प्रथम जीव-हिंसा से सम्बन्धित है।

  3. द्वितीय चोरी से सम्बन्धित है।

  4. तृतीय काम-भोग सम्बन्धी मिथ्याचार से सम्बन्धित है।

  5. चतुर्थ झूठ बोलने से सम्बन्धित है।

  6. पंचम नशीले पदार्थ के सेवन से सम्बन्धित है।

  7. इनमें से प्रत्येक पर तथागत ने लोगों को जीव-हिंसा से विरत रहने, चोरी से

विरत रहने, झूठ बोलने से विरत रहने, काम-भोग सम्बन्धी मिथ्याचार से विरत

रहने और नशीले पदार्थों के सेवन से विरत रहने के लिये उपदेश दिया है। 15. इस कारण स्पष्ट है कि बुद्ध ने ज्ञान की अपेक्षा शील को अधिक महत्त्व क्यों

दिया है?

  1. ज्ञान का उपयोग एक मनुष्य के शील पर निर्भर करता है। शील से पृथक ज्ञान

का कोई मूल्य नहीं है। यही है, जो उन्होंने कहा।

  1. एक अन्य स्थान पर, उन्होंने कहा, ‘‘संसार में शील अतुलनीय है।’’